4/19/2022

राज्य का बहुलवादी सिद्धांत

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प्रश्न; राज्य के बहुलवादी सिद्धांत से आप क्या समझते हैं? 

अथवा" राज्य का बहुलवादी सिद्धांत क्या हैं? राज्य के बहुलवादी सिद्धांत को परिभाषित कीजिए। 

अथवा" राज्य के बहुलवादी सिद्धान्त की विवेचना कीजिए।

राज्य का बहुलवादी सिद्धांत 

rajya ka bahulwadi siddhant;राज्य के बहुलवादी सिद्धांत का जन्म राज्य के एकवादी दृष्टिकोण के विरूद्ध प्रतिक्रिया के रूप में हुआ था। एकवादी सिद्धांत के समर्थकों को ऐसा मानना है कि प्रत्येक राज्य में शक्ति का एक अंतिम सर्वोच्च स्त्रोत हैं। बहुलवादी इस तर्क को स्वीकार नही करते हैं, बहुलवादी राज्य के प्रभुत्व की संकल्पना के विरोधी हैं। 

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बहुलवाद की समीक्षा करने से पहले हमें प्रभुत्व के सिद्धांत को समझ लेना जरूरी है। प्रभुत्व के सिद्धांत का जन्म 16 वीं तथा 17 वीं शताब्दियों में हुआ। यह वह समय था जब यूरोप में राष्ट्रीय राज्यों का उदय हो रहा था। उस समय यह विवाद चल रहा था कि सर्वोच्च कौन हैं-- चर्च (ईसाई धर्म संघ) अथवा राज्य? प्रभुत्व की संकल्पना का विकास जाँ बोदाँ, टाँमस हाॅब्स, ब्लेकस्टोन, जाॅन आस्टिन ने किया। 

जाँ बोदाँ की परिभाषा के अनुसार," नागरिकों तथा प्रजाजनों पर विधि के नियंत्रण से मुक्त सर्वोच्च शक्ति ही 'प्रभुत्व' हैं। उसने आगे कहा," प्रभुत्व का मुख्य लक्षण है, सब नागरिकों के लिए सामान्यतः तथा पृथकतः विधि का निर्माण करने की शक्ति।"

यहाँ बोदाँ की परिभाषा को इसलिए उद्धृत किया गया है कि उसे प्रभुत्व के सिद्धांत का आदि प्रवर्तक अथवा जनक माना जाता हैं। 

टाॅमस हाॅब्स के सत्रहवीं शताब्दी में तथा रूसों और ब्लेकस्टोन ने अठारहवीं शताब्दी में प्रभुत्व के सिद्धांत का उसके विशिष्ट रूप में प्रतिपादन किया। हाॅब्स का तर्क था कि विधि राजनीतिक प्रभु के आदेश के अतिरिक्‍त और कुछ नहीं हैं, इसलिए उसके प्रभुत्व की कोई सीमाएँ नहीं हो सकतीं; तथाकथित दैवी अथवा प्राकृतिक नियमों का राजनीतिक दृष्टि से कोई विधिक महत्व नहीं हैं-- इस नियम का अपवाद यह हैं कि यदि प्रभु उन्हें स्वीकार कर ले अथवा अपना ले तो उनका वही महत्व हो जाता है जो कि प्रभु के आदेश का, किन्तु उसी सीमा तक और उसी रूप में जिसमें कि प्रभु उन्हें स्वीकार करता हैं। 

इन दिनों भारत में जाॅन आस्टिन की परिभाषा को सर्वाधिक व्यापक रूप से उद्धृत किया जाता हैं: "यदि कोई अनिश्चित मानव प्रवर (मानव श्रेष्ट, मानव ज्येष्ठ) स्वभावतः उसी प्रकार के किसी मानव प्रवर के आदेशों का पालन करने का अभ्यस्त न हो, और समाज के बहुसंख्यक लोग उसके आदेशों का आदतवश पालन करते हों तो उस समाज में वह निश्चित मानव प्रवर प्रभु हैं, और वह समाज (उस मानव प्रवर सहित) राजनीतिक तथा स्वतंत्र समाज हैं।" 

बहुलवादी उपर्युक्‍त मत का खण्डन करते हैं। ए. डी. लिंठसे लिखते हैं," यदि हम तथ्यों पर ध्यान दें, तो यह भलीभाँति स्पष्ट है कि राज्य के प्रभुत्व का सिद्धांत ध्वस्त हो गया हैं।" 

हेरोल्ड लास्की का कहना हैं," राजनीतिक दर्शन की दृष्टि से प्रभुत्व के विधिक सिद्धांत को उचित ठहराना असंभव हैं।" वह आगे लिखते हैं," यदि प्रभुत्व की संपूर्ण संकल्पना का परित्याग कर दिया जाये, तो इससे राजनीति विज्ञान को स्थायी लाभ होगा।" 

एक अन्य लेखक का कथन हैं," राजनीति में अन्य कोई थोथी धारणा इतनी नीरस एवं निष्फल नहीं हैं जितनी की राज्य के प्रभुत्व की संकल्पना।" 

बहुलवाद की बीज भूमि 19 वीं शताब्दी में तैयार हुई। गीर्के तथा मेटलेण्ड ने सिद्ध किया कि समुदाय (संघ) प्रत्येक समाज में स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होते हैं, और उनका स्वरूप निगमात्मक होता हैं, प्रत्येक एक की अपनी निश्चित सामूहिक चेतना एवं इच्छा होती हैं। दूर्खोइम ने कार्यात्मक अथवा व्यावसायिक समूहों को महत्व दिया, और कहा कि आर्थिक समूहों को शासनिक प्रक्रिया में प्रतिनिधित्व दिया जाना चाहिए। फ्रांसीसी विद्वान पाॅल बोनकूर ने बतलाया कि व्यावसायिक संघ स्वभावतः तथा अनिवार्यतः ऐसी शक्ति प्राप्त कर लेते हैं जो प्रभु शक्ति के समतुल्य होती हैं। 

बहुलवादी मध्ययुगीन राजनीतिक व्यवस्था को अपना आदर्श मानते हैं। मध्ययुग के अधिकतर काल में राज्य की समाज में प्रमुख अथवा सर्वप्रमुख स्थिति नहीं थी। वस्ततः उस समय यूनानियों तथा रोमवासियों की संकल्पना के राज्य का अस्तित्व ही नहीं था। व्यक्ति के ऊपर नियंत्रण में अनेक संस्थाओं का साझा था, जैसे रोमन चर्च, पवित्र रोमन सम्राट, राजा, सामन्त, शासपत्रित (चार्टर्ड) नगर, श्रेणी इत्यादि। 

बहुलवादी सिद्धांत का यह नाम उसके प्रवर्तकों के इस मुख्य विचार के कारण पड़ा कि सामाजिक सत्ता का स्वरूप एकात्मक नहीं, बल्कि बहुलात्मक (अनेकात्म) हैं, और वह विभक्त होती हैं। उनका विश्वास है कि शक्ति अनेक समूहों एवं हितों में वितरित होती हैं, और इन समूहों एवं हितों में परस्पर संघर्ष, प्रतियोगिता तथा सहयोग चलता रहता हैं, साथ ही साथ उनके इन पारस्परिक संबंधों के रूप निरन्तर बदलते रहते हैं। इस प्रकार शक्ति में राज्य तथा अन्य सामाजिक संस्थाओं का साझा होता हैं। ये संघ स्वाभाविक रूप से और स्वतः उत्पन्न होते हैं, और वे अपने-अपने विशिष्ट क्षेत्रों में राज्य से स्वतंत्र रहकर कार्य करते हैं। बहुलवादियों का यह भी तर्क है कि राज्य इन स्वतंत्र रूप से उत्पन्न तथा स्वन्त्रतापूर्वक कार्य करने वाले समूहों के संबंध में किसी भी महत्वपूर्ण अर्थ में प्रभुत्व संपन्न नहीं हो सकता। 

संक्षेप में," बहुलवादी मानते हैं कि समाज में अन्य महत्वपूर्ण संघ होते हैं जिनकी स्थिति राज्य के समतुल्य होती हैं। उनका कहना है कि मनुष्य की सामाजिक प्रकृति अनेक समूहों के रूप में अपने को मुखरित करती हैं एवं विभिन्‍न उद्देश्‍यों में प्रवृत्त होती हैं-- जैसे धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक, व्यावसायिक, राजनीतिक इत्यादि; और इनमें से कोई एक दूसरों से नैतिक अथवा व्यावहारिक दृष्टि से श्रेष्ठ नहीं होता। 

बहुलवाद के प्रमुख विचारक हैं नेवाइल फिगिस, हेरोल्ड लास्की, ए. डी. लिंडसे, अर्नेस्ट बार्कर, मेरी पार्कर फाॅलिट इत्यादि। राज्य के बहुलवादी सिद्धांत पर तीन मुख्य प्रभाव दृष्टिगोचर होते हैं। उस पर पहला प्रभाव उस वादानुवाद (विचार-विमर्श) का हैं जो समाजशास्त्रीय तथा विधिक क्षेत्रों में राज्य के आर्थिक तथा व्यावसायिक समूहों के साथ संबंधों के विषय में चला हैं। दूसरा प्रभाव नैतिक हैं: मनुष्य में आत्म-अभिव्यक्ति अर्थात् अपने को मुखरित करने की स्वाभाविक प्रवृत्ति हैं, दार्शनिकों ने इस आत्म अभिव्यक्ति की विविधता तथा स्वतंत्रता के मूल्यों को स्वीकार किया हैं, इन मूल्यों के संबंध में जो नैतिक विचार प्रतिपादित किये गये हैं, उनका बहुलवादियों पर गहरा प्रभाव पड़ा हैं। तीसरे, कुछ शताब्दियों पहले पश्चिमी देशों में जो आर्थिक एवं राजनीतिक परिवर्तन हुए उनका प्रतिबिम्ब भी हमें बहुलवादी सिद्धांत में देखने को मिलता हैं।

बहुलवादियों की प्रस्थापनाएँ 

बहुलवादियों की मुख्य प्रस्थापनाएँ निम्नलिखित हैं-- 

1. राज्य केवल उन अगणित सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक तथा अन्य समूहों में एक हैं जिनके द्वारा व्यक्ति रूचियों की तुष्टि तथा अपने हितों का परिवर्धन करते हैं। 

2. ये अगणित समूह केवल राज्य की सृष्टि नहीं हैं, बल्कि वे स्वतंत्र रूप से उद्भूत होते हैं, और राज्य से स्वतंत्र रहकर शक्ति और सत्ता प्राप्त करते हैं। 

3. इन ऐच्छिक संघों के-- जैसे चर्च (धर्म संघ), श्रमिक संघ, व्यावसायिक संगठन इत्यादि के कार्य उतने ही आवश्यक एवं महत्वपूर्ण हैं जितने कि राज्य के।

4. एकवादी राज्य इस योग्य नहीं है कि वह इन संघों पर निरंकुश सत्ता का प्रयोग कर सके, और न वह इनके कार्यकलाप का बुद्धिमानी तथा कुशलता के साथ नियमन ही कर सकता है। 

5. प्रभुत्व की एकवादी संकल्पना सामाजिक वास्‍तविकता के साथ मेल नहीं खाती, और इसके अतिरिक्त वह समाज के विकास को स्वाभाविक तथा कल्याणकारी दिशाओं में अग्रसर होने से रोकती हैं और इस प्रकार वह समाज को अपार हानि पहुँचाती हैं। 

बहुलवादी सिद्धांत की समीक्षा 

न बहुलवादी और न एकवादी ही प्राचीन यूनानियों से प्रेरणा लेते हैं। यूनानी विचारकों ने राज्य को अति ऊँचा स्थान दिया, किन्तु उन्होंने उसे विधि से परे अथवा ऊपर नहीं माना। उनका रूढ़िगत विधि में विश्वास था, उस विधि में देवताओं के आदेश अथवा मनुष्य का विवेक सम्मिलित था, और वह किसी भी राजनीतिक शक्ति की आज्ञाओं के ऊपर थी। यूनानियों के चिन्तन का ढंग एकवादियों के लिए उत्साहवर्धक नही हो सकता और न यूनानी विचारक बहुलवादियों के उस विचार का समर्थन करते हैं जो राज्य की स्थिति को गिराकर उसे अन्य समुदायों के स्तर पर लाकर खड़ा कर देता हैं। यूनानी राज्य को सर्वोच्च सामाजिक संस्था मानते थे। 

अरस्तु के शब्दों में,' राज्य सभी संघों में सर्वोच्च हैं, उसमे शेष सभी समाविष्ट हैं।" इस प्रकार यूनानी अन्य संघों के अस्तित्व को मनुष्यों के लिए आवश्यक मानते थे, किन्तु उनकी निगाह में राज्य की स्थिति अद्धितीय थी। इससे स्पष्ट है कि एकवादी तथा बहुलवादी, दोनों ही प्रत्ययात्मक दृष्टि से आधुनिक युग के अधिक निकट हैं। 

बहुलवादी राज्य का अंत करने की कल्पना नहीं करते। उनका कहना यह है कि राज्य को प्रभुत्व के सभी दावों से वंचित कर दिया जाये और उसे नीचे उतार कर उसकी उचित स्थिति पर पहुँचा दिया जाये। राज्य का काम होना चाहिए विभिन्न संघों के बीच तालमेल बिठलाना तथा समझौता कराना, न कि उन पर अपनी इच्छा थोपना।

बहुलवाद का उदारवाद के साथ निकट का संबंध हैं। किन्तु एक अन्य दृष्टिकोण से यह भी कहा जा सकता है कि वह उदारवाद विरूद्ध प्रतिक्रिया हैं; उदारवाद व्यक्ति को उस सामाजिक पर्यावरण से जिसमें उसका अस्तित्व हैं, पृथक कर देना चाहता हैं। इसके विपरीत बहुलवाद उसका समाज के साथ पुनः एकीकरण करना चाहता हैं, किन्तु साथ ही साथ वह भी उसे राज्य की अनियंत्रित शक्ति के अधीन नहीं बनाना चाहता। 

बहुलवादियों का सिद्धांत भी दोषों से मुक्त नहीं है। क्या एक जटिल समाज में सत्ता की एकता एवं विधि की एकरूपता को समाप्‍त कर देना संभव हैं? विभिन्न विरोधी समूहों के पास्परिक संघर्षों को कैसे रोका जायेगा? स्वयं समूहों के भीतर तथा उनके बीच जो विस्फोटक असमतियाँ अनिवार्यतः उठती रहती हैं उनका समाधान कैसे किया जाये अथवा उनसे कैसे निपटा जाये? राज्य को छोड़कर ऐसी कौन एजेंसी हो सकती है जो मजदूरों तथा पूँजीपतियों के विवादों का समाधान कर सके? ये कुछ प्रश्न हैं जो बहुलवादियों की प्रस्थापनाओं की कमियों की ओर इंगित करते हैं। ऐसे प्रश्नों का उत्तर शक्तिशाली राज्य ही हो सकता हैं। 

एक बात और भी हैं, वर्तमान में विश्व में जो विभिन्न प्रकार के परिवर्तन हो रहे हैं वे इस बात की आवश्‍यकता को स्पष्ट करते हैं कि राज्य में एक शक्तिशाली सार्वजनिक सत्ता होनी चाहिए। प्रत्येक देश में राज्य की शक्तियों तथा कार्यों का प्रसार हो रहा हैं, राज्य का प्रभुत्व पहले से अधिक निरंकुश होता जा रहा हैं। 

किन्तु बहुलवादियों के संदेश का अच्छा स्वागत हुआ हैं। प्रत्येक राज्य में बड़ी संख्या में सलाहकार तथा मंत्रणात्मक समितायों की रचना की गयी हैं। ये समितियाँ समाज के विभिन्न सामाजिक, आर्थिक, व्यावसायिक एवं सांस्कृतिक समूहों का प्रतिनिधित्व करती हैं, और मन्त्रणात्मक व्यवस्था शासनिक नीति-निर्माण का एक अभिन्न अंग बन गयी हैं।

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