2/01/2022

संविधान और संविधानवाद में अंतर

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संविधान और संविधानवाद में अंतर 

samvidhanvad or samvidhan me antar;मोटे रूप में संविधानवाद और संविधान में कोई अंतर नही देखाई देता हैं क्योंकि संविधान से संविधानवाद की अभिव्यक्ति होती है और संविधान पर संविधानवाद बहुत कुछ आधारित होता हैं, तथापि इन दोनों में कुछ अन्तर अवश्य हैं। संविधानवाद और संविधान में निम्नलिखित अंतर हैं-- 

1. परिभाषा संबंधी अंतर 

परिभाषा की दृष्टि देखें तो जहाँ संविधान एक संगठन का प्रतीक है वहाँ संविधानवाद एक विचारधारा का प्रतीक है। एक संविधान में किसी राज्य के मूल्य, विश्वास और राजनीतिक आदर्श सम्मिलित रहते हैं, जब कि संविधानवाद में उन सिद्धांतों का संकलन पाया जाता है जिनके आधार पर शासन शक्तियों और शासकों के अधिकारों के बीच संबंधों का समायोजन होता है। संविधानवाद एक दर्शन है और संविधान उस दर्शन की अभिव्यक्ति हैं। 

2. प्रकृति संबंधी अंतर

प्रकृति की दृष्टि से भी दोनों में अंतर पाया जाता है। संविधानवाद में लक्ष्यों और उद्देश्यों की प्रमुखता होती है जबकि संविधान में साधनों की सुव्यवस्था की प्रधानता मानी जाती है। संविधान रूपी साधन के माध्यम से संविधानवाद रूपी साध्य के उद्देश्यों की प्राप्ति का प्रयास किया जाता हैं। 

3. उत्पत्ति संबंधी अंतर 

उत्पत्ति की दृष्टि से संविधानवाद हमेशा विकास का प्रतिफल रहा है। संविधान साधारणतः निर्मित होते रहे हैं जो समय के साथ-साथ संशोधित तथा परम्पराओं के माध्यम से परिवर्तित होते रहते हैं। 

4. क्षेत्र संबंधी अंतर 

क्षेत्र की दृष्टि से भी संविधानवाद और संविधान में अंतर हैं। संविधानवाद एक अन्तभूर्तकारी (inclusive) धारणा हैं तो संविधान अपवर्जक (exclusive) धारणा हैं। प्रत्येक देश का संविधान अलग-अलग होता हैं जबकि संविधानवाद कई देशों का एकसा हो सकता हैं। परन्तु प्रत्येक देश के संविधानवाद में अपनी अल्प मौलिकता अवश्य देखने को मिलती हैं। यद्यपि संविधानवाद की कई देशों में समानता के कारण संविधानों पर भी समानता का ऊपरी आवरण चढ़ जाता हैं, लेकिन यथार्थ रूप में विभिन्न संविधानों में मात्रा और प्रकार के दोनों ही अंतर देखने को मिलते हैं। 

5. औचित्य संबंधी अंतर 

औचित्य की दृष्टि से यदि विचार करें तो जहां संविधानवाद में आदर्शों को औचित्य का प्रतिपादन मुख्यतया विचारधारा (ideologv) के आधार पर होता हैं वहाँ संविधान का औचित्य मुख्यतः विधि के आधार पर ठहराया जाता हैं। 

इतना होने पर भी संविधानवाद और संविधान का चोली दामन का साथ हैं, दोनों एक-दूसरे के सहायक एवं पूरक हैं।

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