वैश्वीकरण क्या हैं? वैश्वीकरण के गुण और दोष


वैश्वीकरण से आशय एवं वैश्वीकरण का अर्थ अथवा वैश्वीकरण किसे कहते हैं?

बढ़ते हुए विदेशी व्यापार के कारण विभिन्न देशों के बाजारों एवं उनमे बेची जाने वाली वस्तुओं मे एकीकरण हुआ हैं। विदेशी व्यापार की बढ़ती हुई प्रवृति ने अब विभिन्न देशों के बाजारों को बहुत निकट ला दिया है। उन्नत प्रोद्योगिकी ने इस निकटता मे महत्वपूर्ण भूमिका अदा की हैं और सम्पूर्ण विश्व को एक बड़े गांव मे बदल दिया यही वैश्वीकरण है, जहाँ विभिन्न देशों के बाजार परस्पर जुड़कर एक इकाई के रूप मे कार्य करते है। 
इस प्रकार वैश्वीकरण से आशय सम्पूर्ण विश्व का परस्पर सहयोग एवं समन्वय से एक बाजार के रूप मे कार्य करने से हैं। वैश्वीकरण की प्रक्रिया के अन्तर्गत वस्तुओं एवं सेवाओं के एक देश से दूसरे देश मे आने एवं जाने के अवरोधों को समाप्त कर दिया जाता हैं।
वैश्वीकरण को अनेक नामों से भी पुकारा जाता हैं, यथा भूमण्डलीकरण, जागतीकरण, वैश्वायान, पृथ्वीकरण, वैश्वीकरण आदि। आज हम जानेंगे वैश्वीकरण किसे कहते हैं? वैश्वीकरण क्या है? वैश्वीकरण का अर्थ और वैश्वीकरण के गुण और दोष।

वैश्वीकरण क्या है? (vaishvikaran kya hai) 

एन्थनी गिडिन्स के अनुसार, वैश्वीकरण विश्वव्यापी सामाजिक सम्बन्धों का सघनीकरण है।
वैश्वीकरण वस्तुतः व्यापरिक क्रिया-कलापो विशेषकर विपणन संबंधी क्रियाओं का अंतर्राष्ट्रीयकरण करना हैं जिसमें संपूर्ण विश्व बाजार को एक ही क्षेत्र के रूप में देखा जाता हैं।
वैश्वीकरण
दूसरे शब्दों में वैश्वीकरण वह प्रक्रिया हैं, जिसमें विश्व बाजारों के मध्य पारस्परिक निर्भरता उत्पन्न होती है और व्यापार देश की सीमाओं में प्रतिबंधित न रहकर विश्व बाजारों में निहित तुलनात्मक लागत सिद्धांत के लाभों को प्राप्त करने सफल हो जाता हैं। साधारण शब्दों मे वैश्वीकरण का अर्थ है देश की अर्थव्यवस्था को विश्व की अर्थव्यवस्था के साथ एकीकृत करना।

वैश्वीकरण के गुण और दोष (vaishvikaran ke gun aur dosh)

वैश्वीकरण के गुण (लाभ) एवं महत्व 

1. नवीन तकनीकों का आगमन 
वैश्वीकरण द्वारा विदेशी पूँजी के निवेश मे वृद्धि होती है एवं नवीन तकनीकों का आगमन होता हैं, जिससे श्रम की उत्पादकता एवं उत्पाद की किस्म में सुधार होता है।

2. जीवन-स्तर में वृद्धि
वैश्वीकरण से जीवन-स्तर मे वृद्धि होती है, क्योंकि उपभोक्ता को पर्याप्त मात्रा मे उत्तम किस्म की वस्तुयें न्यूनतम मूल्य पर मिल जाती हैं।


3. विदेशी विनियोजन
वैश्वीकरण के विकसित राष्ट्र अपनी अतिरिक्त पूँजी अर्द्धविकसित एवं विकासशील राष्ट्रों  मे विनियोग करते है। विदेशी पूँजी के आगमन से इन देशों का विनियोग बड़ी मात्रा मे हुआ है।

4. विदेशों मे रोजगार के अवसर 
वैश्वीकरण से एक देश के लोग दूसरे देशों मे रोजगार प्राप्त करने मे सक्षम होते हैं।

5. विदेशी व्यापार मे वृध्दि 
आयात-निर्यात पर लगे अनावश्यक प्रतिबन्ध समाप्त हो जाते है तथा संरक्षण नीति समाप्त हो जाने से विदेशी व्यापार मे पर्याप्त वृद्धि होती है।

6. अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग मे वृध्दि 
जब वैश्वीकरण अपनाया जाता है, तो आर्थिक सम्बंधों मे तो सुधार होता ही है, साथ ही राजनीतिक सम्बन्ध भी सुधरते है। आज वैश्वीकरण के कारण भारत के अमेरिका, जर्मनी एवं अन्य यूरोपीय देशों से सम्बन्ध सुधर रहे हैं।

वैश्वीकरण के दोष (हानियाँ) एवं दुष्परिणाम 

1. आर्थिक असन्तुलन
वैश्वीकरण के कारण विश्व मे आर्थिक अन्तुलन पैदा हो रहा है। गरीब राष्ट्र अधिक गरीब एवं अमीर राष्ट्र अधिक सम्पन्न हो रहे हैं। इसी प्रकार देश मे भी गरीब एवं अमीर व्यक्तियों के बीच विषमता बढ़ रही हैं।

2. देशी उधोगों का पतन
वैश्वीकरण के कारण स्थानीय उधोग धीरे-धीरे बन्द होते जा रहे हैं। विदेशी माल की प्रतियोगिता के सामने देशी उधोग टिक नही पाते हैं। उनका माल बिक नही पाता है या घाटे मे बेचना पड़ता है। यही कारण है कि देश मे कई उधोग बन्द हो गये है या बन्द होने की कगार पर हैं।

3. बहुराष्ट्रीय कंपनियों का प्रभुत्व 
विश्व के औधोगिक जगत पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों (मल्टी नेशनल) का प्रभुत्व एवं शिकंजा बढ़ता जा रहा है। ये बड़ी-बड़ी कम्पनियां स्थानीय उधोगों को निगलती जा रही है एवं स्थानीय उधोग या तो बन्द हो रहे है या इनके अधीन जा रहे है जैसे-कोका कोला कम्पनी ने भारत के थम्सअप, लिम्का के उत्पादन को अपने अधीन कर लिया हैं।

4. बेरोजगारी में वृद्धि 
वैश्वीकरण के कारण विदेशी माल मुक्त रूप से भारतीय बाजारों मे प्रवेश कर गया है। परिणामस्वरूप स्थानीय उधोग बन्द हो रहे है एवं बेरोजगारी (बेकारी) बढ़ रही हैं। देश मे औधोगिक श्रमिकों की संख्या घट रही हैं।
5. राष्ट्र प्रेम की भावना को आघात 
वैश्वीकरण राष्ट्र प्रेम एवं स्वदेश की भावना को आघात पहुँचा रहा है। लोग विदेशी वस्तुओं का उपभोग करना शान समझते है एवं देशी वस्तुओं को घटिया एवं तिरस्कार योग समझते हैं।

6. अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं का दबाव 
अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व, गैट आदि अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं के दबाव में सरकारे काम कर रही हैं। हितों की अवहेलना करके सरकार को इनकी शर्तें माननी पड़ती हैं। भारत जैसे राष्ट्र को अपनी आर्थिक, वाणिज्यिक एवं वित्तीय नीतायां इन संस्थाओं के निर्देशों के अनुसार बनानी पड़ रही हैं।

टिप्पणी पोस्ट करें

0 टिप्पणियां