5/22/2022

विदेश नीति का अर्थ, भारत विदेश नीति निर्धारक तत्व, सिद्धांत/आर्दश

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प्रश्न; विदेश नीति से आप क्या समझते हैं? भारतीय विदेश नीति के निर्धारक तत्वों का विवेचन कीजिए। 
अथवा" विदेश का अर्थ स्पष्ट करते हुए, भारतीय विदेश नीति के सिद्धांतों की व्याख्या कीजिए। 
अथवा" भारतीय विदेश नीति के आर्दश बताइए। 
उत्तर-- 
bhartiya videsh niti ke nirdharak tatva siddhant;भू-भाग की दृष्टि से भारत विश्व में सात नम्बर और जनसंख्या की दृष्टि से दूसरे स्थान पर आता हैं। इसलिए भारत की विदेश नीति विश्व की राजनीति पर गहरा प्रभाव पड़ता हैं। स्वतंत्रता से पूर्व भारत की कोई विदेश नीति नही थी, क्योंकि भारत ब्रिटिश सरकार के अधीन था। भारत अब एक स्वतंत्र और प्रजातांत्रिक राष्ट्र हैं।
2 सितम्बर 1946 को पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपने भाषण मे भारत की विदेश नीति के लक्ष्यों को स्पष्ट करते हुए कहा कि "हम संसार के अन्य राष्टों से निकट और प्रत्यक्ष संबंध स्थापित करने तथा सहयोग और शांति कायम रखने के लिए बड़े उत्सुक हैं।" आज हम विदेश नीति क्या है, विदेश नीति का अर्थ, भारत की विदेश नीति के निर्धारक तत्व और भारतीय विदेश नीति के सिद्धांत या आर्दश जानेंगे।

विदेश नीति का अर्थ (videsh niti kise kahte hai)

विदेश नीति वह नीति या दृष्टिकोण है, जिसके द्वारा कोई राष्ट्र विश्व के अन्य राष्टों के साथ व्यवहार करता है जिसमें संबंधों का निर्माण या उनसे दूरी अथवा अनुकूलता या प्रतिकूलता बनायी जाती हैं। यदि देखा जाये तो विदेश नीति वह कला है जो अंतर्राष्ट्रीय राजनीति का शुद्ध आधार प्रस्तुत करती हैं। एक राष्ट्र के क्या-क्या राष्ट्रीय हित है वह किस प्रकार उन्हें सुरक्षित रखना व विकसित करना चाहता हैं।
भारत की विदेश नीति
जाॅर्ज मोडलेस्की के अनुसार, "विदेश नीति एक राज्य की गतिविधियों का सुव्यवस्थित व विकासशील रूप है, जिसके द्वारा एक राज्य अन्य राज्यों के व्यवहार को अपने अनुकूल बनाने अथवा यदि ऐसा न हो पाये तो अन्तर्राष्ट्रीय वातावरण के अनुसार बदलने का प्रयास करता है।"
यदि माॅडलेस्की की परिभाषा की विवेचना की जाये तो निम्नांकित तथ्य सामने आते है--
1. अपनी इच्छानुसार दूसरे राज्यों की गतिविधियों पर नियंत्रण।
2. अपनी गतिविधियों का व्यवस्थित रूप मे विकास।
3. आवश्यकतानुसार अपनी गतिविधियों मे परिवर्तनों या इन पर भी नियंत्रण रखना।
4. अंतर्राष्ट्रीय संबंधों का विकास।
एंडरसन व क्रिस्टल के अनुसार," विदाश नीति, नीति के सामान्य सिद्धांतों का निर्धारण एवं क्रियान्वयन करती है जिसके द्वारा किसी राज्य के आचरण को प्रभावित करके अपने महत्वपूर्ण हितों की सुरक्षा एवं पुष्टीकरण करता है।
इस परिभाषा का विश्लेषण हमे निम्नांकित तथ्य प्रस्तुत करता है--
1. नीति के निर्धारण व क्रियान्वयन।
2. दूसरे राज्यों के आचरणों को अपने हितों के अनुसार प्रभावित करना।
3. अपने हितों की सुरक्षा तथा उनका विकास।

भारत की विदेश नीति के निर्धारक तत्व (bhartiya videsh niti ke nirdharak tatva)

भारत की विदेश नीति के निर्धारक तत्व इस प्रकार है-- 
1. राष्ट्रीय हित
विदेश नीति मे राष्ट्र हित सबसे महत्वपूर्ण होता हैं। प्रत्येक देश अपने देश को शक्तिशाली बनाने के लिए प्रयास करता हैं कि उसके राष्ट्रीय स्वार्थ सुरक्षित रह पायें। ये हित हमेशा एक से नहीं रहते। समय-समय पर यह आवश्यकतानुसार परिवर्तित होते हैं।
2. अन्तर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा
भारत की विदेश नीति का निर्धारक तत्व अन्तर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा मे वृद्धि करना है।
3.राष्ट्रों के मध्य न्यायपूर्ण तथा सम्मानजनक संबंध बनाए रखना
भारत की विदेश नीति का आर्दश राष्ट्रों के मध्य न्यायपूर्ण और सम्मानजनक संबंध बनाए रखना हैं।
4. सैनिक तत्व 
नवोदित भारत सैनिक दृष्टि से निर्बल था अतः विदेशी नीति के निर्धारकों ने यह उपयुक्त समझा की दोनों गुटो की सहानुभूति अर्जित की जाये। यह तभी संभव था जब गुटनिरपेक्षता और सह अस्तित्व की नीति अपनाई जाती। अपनी रक्षा के लिए अनेक दृष्टियों से वह पूरी तरह विदेशो पर निर्भर था। भारत की दुर्बल सैनिक स्थिति उसे इस बात के लिए बाध्य करती रही थी कि विश्व की सभी महत्वपूर्ण शक्तियों के साथ मैत्री बनाये राखी जाये। प्रारम्भ से ही भारत राष्ट्रमण्डल का सदस्य बना रहा, उसका भी यही राज था कि सैनिक दृष्टि से भारत ब्रिटेन पर ही निर्भर था।
5. राष्ट्र की प्रतिष्ठा और आर्दश
एक शांतिप्रिय तथा नैतिकता से पूर्ण मनोवृत्ति वाला राज्य अपनी शक्ति का प्रयोग यकायक नही करता है। वह संघर्ष शांतिपूर्ण तरीकों से ही हल करने मे रूचि लेता है और उन सभी राष्ट्रों के साथ सहयोग करता है, जो विश्व शांति मे अपनी रूचि रखते है। इसके विपरीत जो राष्ट्र आतंकवादी है, युद्धप्रिय हैं वे अपनी विदेश नीति में उग्रता रखते हैं और युद्धों को अपना साधन मानकर दूसरे राष्ट्रों पर हावी होकर उन्हें प्रभावित करते हैं।
6. सांस्कृतिक कारक
विदेश नीति को निर्धारित करने मे सांस्कृतिक कारकों का महत्व होता हैं। अपनी परंपराएं सामाजिक आदर्शों तथा मूल्यों को ध्यान मे रखकर विदेशनीति का निर्माण करते हैं।
7. भौगोलिक स्थिति
यह दो तरह से प्रभावित करती हैं।
1. स्थित 2. देश के अंदर संसाधन तथा उसका उपयोग।
यदि कोई राष्ट्र बहुत महत्वपूर्ण राजनैतिक स्थित मे है तो अपनी प्रकार विश्व बाजार मे उपयोग दे सकता है अथवा किस प्रकार उसका राजनीतिक उपयोग हो सकता है आदि को ध्यान मे रखकर विदेश नीति बनायी जाती हैं।
8. तकनीकी विकास 
स्वतंत्रता के समय भारत एक पिछड़ा हुआ देश होने के साथ अविकसित प्रौद्योगिकी और निम्न स्तर का औद्योगीकरण था, जिसकी वजह से भारत तकनीकी विकास और औद्योगीकरण के लिए विकसित राष्ट्रों के आयात पर निर्भर करता था। परन्तु बाद में भारत ने धीरे धीरे तकनीकी और औद्योगिक विकास किया, भारतीय वैज्ञानिको ने तकनीकी में सफलता प्राप्त कर ली है। आज भारत तीसरी दुनिया के देशो में अपनी नई तकनीक और औद्योगिक मॉल निर्यात कर रहा है। राकेट टेक्नोलॉजी, सैटेलाइट टेक्नोलॉजी एटॉमिक टेक्नोलॉजी और बढ़ता हुआ औधोगिक उत्पादन इन सभी ने भारत की भूमिका को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर और ज्यादा बढ़ा दिया है भारत और विकसित राष्ट्रों के बीच आज भी बहुत बढ़ा अंतर है भारत आज भी विकासशील राष्ट्र है जो अपने विकास के लिए विकसित राष्ट्रों पर निर्भर करता है। अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संस्थाओ पर भारत की लगातार बढ़ती निर्भरता उसकी विदेश नीति की सफलता में एक बड़ा खतरा बन सकती है। 
9. वैचारिक तत्व 
भारत की विदेश नीति के निर्धारण में शांति और अहिंसा पर आधारित गाँधीवादी विचारधारा का भी गहरा प्रभाव दिखाई देता है। इस विचारधारा से प्रभावित होकर ही संविधान के अनुच्छेद ५१ में विश्व शांति की चर्चा की गई है भारत के द्वारा हमेशा ही विश्व शांति और शांतिपूर्ण सह जीवन का समर्थन तथा साम्राज्यवाद और प्रजातीय विभेद का घोर विरोध किया गया है। भारत ने लोकतान्त्रिक समाजवाद को अपनी शासन व्यवस्था का आधार बनाया है। भारत की विदेश नीति की नींव डालने वाले पं. जवाहरलाल नेहरू पाश्चात्य लोकतंत्रीय परम्परा से बहुत प्रभावित थे। वे पशिचमी लोकतंत्रवाद और साम्यवाद दोनों की अच्छाइयों को पसंद करते थे। इस प्रकार की समन्वयकारी विचारधारा ने गुट निरपेक्षता की नीति के विकास में योगदान दिया।

भारत की विदेश नीति के सिद्धांत अथवा आर्दश

भारत की विदेश नीति के सिद्धांत या आर्दश निम्नलिखित है-- 
1. तटस्थता अथवा असंलग्नता
भारत का सर्वाधिक महत्वपूर्ण सिद्धांत यह है कि इसने किसी भी सैनिक गुट मे सम्मिलित न होकर तटस्थता अथवा असंलग्नयता की नीति अपनाई है। लेकिन तटस्थता का यह अर्थ बिल्कुल भी नही है कि भारत विश्व की मे घटित विभिन्न घटनाओं को अनदेखा करगा और ना ही विश्व से अगल अपने को निष्क्रिय रखना हैं।
2. अन्तर्राष्ट्रीय सद्भाव, सहयोग एवं मित्रता को बनाए रखना
भारत की विदेश नीति का एक आर्दश अन्तर्राष्ट्रीय सद्भाव, सहयोग एवं सभी राष्ट्रों से मित्रता बनाए रखने का प्रयास करना हैं।
3. सहअस्तित्व अथवा पंचशील
भारत ने सदैव से ही सहनशीलता के रास्ते को अपनाया है यही सहअस्तित्व आधार हैं। विभिन्न राष्ट्रों के अस्तित्व के प्रति सहनशीलता को पंचशील के नाम से जाना जाता हैं।
4. लोकतंत्र में विश्वास और समर्थन
भारतीय विदेश नीति लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था का समर्थन करती है। हालांकि, भारत विचारधाराओं के थोपे जाने में विश्वास नहीं करता है, इसलिए भारत ने सरकार के किसी भी रूप चाहे वह एक लोकतंत्र, राजशाही या सैन्य तानाशाही हो के साथ संबंधों का प्रयास किया है। भारत का मानना है कि यह सबसे अच्छा है कि किसी देश के लोगों पर अपने नेताओं को चुनने या हटाने या शासन के रूप को बनाए रखने या बदलने के लिए छोड़ दिया जाए। अर्थात भारत किसी अन्य देश या समूह द्वारा बल या अन्य माध्यमों से किसी विशेष देश में शासन परिवर्तन या उल्लंघन के विचार का समर्थन नहीं करता है।
5. साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद एवं रंगभेदपरक असमानता का विरोध
भारत हमेशा से ही साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद एवं रंगभेद असमानता का विरोधी रहा हैं अतः यह भारत की विदेश नीति का सिद्धांत हैं।
6. विश्व शांति को प्रोत्साहन
भारत विश्व शांति मे विश्वास रखता है। भारत विश्व शांति के लिए हमेशा प्रयासरत रहता हैं। भारत की विदेश नीति का एक सिद्धांत विश्व शांति को प्रोत्साहन देना हैं।
7. आन्तरिक मामलो मे विदेशी हस्तक्षेप का विरोध
भारत की विदेश नीति का सिद्धांत आन्तरिक मामलो मे विदेशी हस्तक्षेप का भारत विरोधी हैं भारत इसका विरोध करता हैं।
8. वैश्विक मुद्दों पर आम सहमति पर जोर
भारत वैश्विक मुद्दों पर चर्चा और इस तरह से विश्व व्यापार व्यवस्था, जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद, बौद्धिक संपदा अधिकारों, वैश्विक शासन के रूप में वैश्विक आयामों के मुद्दों पर वैश्विक आम सहमति की वकालत करता है।
9. संयुक्त राष्ट्र में विश्वास
भारतीय विदेश नीति की एक मुख्य विशेषता संयुक्त राष्ट्र संघ में उसका विश्वास है। संयुक्त राष्ट्र का संस्थापक सदस्य होने के नाते उसके उद्देश्यों और सिद्धांतों के लिए भारत हमेशा प्रतिबद्ध रहा है और इसके शांति-संचालन कार्यों में महत्वपूर्ण योगदान देता रहा है। भारत जी -4 समूह का सदस्य है और यह राष्ट्र की सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के लिए भी इच्छुक है।
10. परमाणु ऊर्जा का शांतिपूर्ण उपयोग एवं परमाणु अप्रसार
गुट निरपेक्ष देशों के समूह के साथ भारत ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निरस्त्रीकरण के विचार को हमेशा आगे रखा था हालांकि भारत परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग के विचार का समर्थन करता है। अब, यद्यपि भारत एक परमाणु हथियार संपन्न राज्य है, लेकिन विदेश नीति के अपने इस मूल सिद्धांत के लिए प्रतिबद्ध है कि परमाणु हथियारों के वैश्विक उन्मूलन से इसकी सुरक्षा के साथ-साथ दुनिया के बाकी हिस्सों में भी सुरक्षा में वृद्धि होगी, साथ ही भारत प्रथम प्रयोग न करने की नीति और गैर परमाणु राष्ट्रों के विरुद्ध भी परमाणु हथियार का प्रयोग न करने पर अपनी सहमति व्यक्त करता है।
इस प्रकार भारत की विदेश नीति शांति और सहयोग पर आधारित होने के साथ ही अपने राष्ट्रीय हितों की प्राप्ति पर भी जोर देती है। राष्ट्रों के मध्य सहयोगात्मक संबंधों के लिए अंतरराष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय सहयोग पर बल देने के साथ ही मतभेद के द्विपक्षीय मुद्दों के समाधान हेतु भारत हमेशा से द्विपक्षीय बातचीत पर बल देता आया है बदलते वैश्विक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए भारत ने अपनी विदेश नीति को नया आयाम देने का प्रयास किया है। भारत अब यह सुनिश्चित करने के लिए प्रयासरत है कि वह वैश्विक मुद्दों और कार्यक्रमों को आकार देने में एक महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करे। भारत अब नियम का पालन करने के बजाय नियम बनाने वाले देश के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज करना चाहता है। आज भारत बहु-ध्रुवीय विश्व में एक मजबूत ध्रुव के रूप में उभर रहा है। इसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य बनने की आकांक्षा से जोड़ा जाता है, जिसके लिए बड़ी संख्या में देशों ने भारत को समर्थन का वादा किया है। यह भी पढ़ें; विदेश नीति को प्रभावित करने वाले तत्व

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