7/15/2023

पल्लवन का अर्थ, महत्व, प्रकार

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प्रश्न; पल्लवन किसे कहते हैं? पल्लवन को परिभाषित कीजिए। 

अथवा", पल्लवन की प्रक्रिया को समझाते हुए, पल्लवन का हिंदी भाषा में महत्व बताइए। 

अथवा", पल्लवन से आप क्या समझते हैं? 

अथवा", पल्लवन के प्रकार लिखिए। 

उत्तर--

पल्लवन का अर्थ (pallavan kise kahate hain)

पल्लवन प्रक्रिया संक्षेपण प्रक्रिया के ठीक विपरीत है। संक्षेपण में मूलपाठ का सार प्रस्तुत किया जाता है, जबकि पल्लवन में मूल कथन को विस्तृत करते हुए प्रस्तुत किया जाता है। पल्लवन का सीधा तथा स्पष्ट अर्थ है विस्तार करना अथवा बढ़ाना। हिंदी भाषा में पल्लवन संक्षेपण का विपरीतार्थक हैं। पल्लवन किसी भावपूर्ण वाक्य, कथन, वाक्यांश, लोकोक्ति अथवा पद्यात्मक सुक्ति को समझाकर लिखने की एक कला है। यह विचारों का एक ऐसा क्रमबद्ध पुनप्रस्तुतिकरण हैं, जिसमें उदाहरण के सहारे बात को स्पष्ट करना होता हैं। 

पल्लवन हेतु दिये गये भाव, विचार अथवा सुक्ति के अर्थ तथा भाव को विस्तार करते हुए एक निबंध लिखा जा सकता है पर यहाँ स्पष्ट कर देना उचित होगा कि पल्लवन निबंध नहीं है। निबंध लेखन में पर्याप्त स्वतंत्रता रहती हैं, जबकि पल्लवन लेखन को बँधे-बंधाये तथा एक छोटे दायरे में ही रहना पड़ता हैं। इसे विषय से इधर-उधर होने की छूट नहीं मिलती है। वैसे पल्लवन में मूल भाव या विचार की व्याख्या होती है, पर यह ध्यान रहे कि पल्लवन व्याख्या नहीं है। व्याख्या में प्रसंग, निर्देश, उदाहरण एवं टीका-टिप्पणी या आलोचना-समालोचना करने की स्वतंत्रता होती हैं। पल्लवन मुख्यतः एक संक्षिप्त रचना हैं जो प्रायः एक ही अनुच्छेद में लिखी होती हैं।

पल्लवन की परिभाषा (pallavan ki paribhasha)

एस. टी. इमाम के अनुसार," Amplification is an act of expansion or a enlargement of thought, process by manner of representation. It is a diffcesive discussion. It is dilating upon all the particulars of a subjaect by way of illustration and various ex- Camples and process." अर्थात् विस्तारीकरण विचारों के विस्तारण अथवा अभिव्यक्ति की प्रक्रिया है। यह विचारों का विस्तारण है। यह दृष्टान्तों, विभिन्न उद्धरणों और प्रमाणों से संबंधित सभी विवरणों को पल्लवित करता है।

बेकन के विचार के शब्दों में," विस्तारण किसी एक विचार को एक अनुच्छेद में विस्तृत करना है। उसका उद्देश्य नियंत्रित होता है तथा इसमें मूल विचार को विकृत करने तथा अवांछनीय सामग्री देने का निषेध होता है।

डॉ. मुशीराम शर्मा कहते हैं कि," वस्तुतः किसी सूत्रबद्ध अथवा संगुफित विचार या भाव के  संविकासन को विस्तारण कहते हैं। 

डॉ. चन्द्रपाल के अनुसार," विस्तारण भाषा अभिव्यक्ति की प्रविधि है, जिसमें मूल कथन अथवा सूक्ति का व्याख्यापरक अर्थ समभावी रचनाओं और उदाहरणों से व्यक्त किया जाता है। विस्तारण में सामान्यतः विषय शीर्षक अथवा लघु-अनुच्छेद व्याख्यात्मक ढंग से विस्तारपूर्वक लिखने की अपेक्षा होती है।

पल्लवन की प्रक्रिया/पल्लवन करते समय ध्यान रखने योग्य बातें 

पल्लवन करते समय निम्नांकित बातों को ध्यान में रखना चाहिए-- 

1. सर्वप्रथम मूलपाठ को पढ़कर उसके मूलभाव को हृदयगंम करना चाहिए। इसके साथ ही पूरे पाठ का समग्रभाव से सुपरिचित हो जाना चाहिए।

2. अवतरण आए विशेष शब्दों, सूक्तियों आदि को ध्यान से पढ़कर उसका स्पष्ट भाव समझ लेना चाहिए।

3. पल्लवन में केन्द्रीय भाव की मूल तथा गौण दिशाओं पर विचार करने के पश्चात् उनमें से उपयोगी अंश अपनाया जा सकता है।

4. मूलभाव को स्पष्ट करने के लिए समतुल्य उदाहरणों का उपयोग किया जा सकता है। इससे भावात्मक स्थिति पर्याप्त स्पष्ट हो जाती है।

5. मूलभाव को केन्द्र में रखते हुए अनुच्छेद के विभिन्न भावों को पूर्वक्रमानुसार रखना ही उपयोगी होता है।

6. पल्लवन में ध्यान रखना चाहिए कि अनावश्यक उदाहरण या अनावश्यक चर्चा से विस्तार नहीं होना चाहिए।

7. पल्लवन में व्याख्यात्मक रूप अपनाकर भाव या भाषा सौन्दर्य की चर्चा नहीं होनी चाहिए।

8. किसी उक्ति या कथन को असहमत होने पर भी उस पक्ष की चर्चा करनी होगी, किन्तु उसका खण्डन नहीं करना चाहिए।

9. पल्लवन की भाषा सरल, सहज तथा बोधगम्य होनी चाहिए। अनावश्यक चमत्कारिक या अलंकारिक भाषा के प्रयोग से बचना चाहिए।

10. पल्लवन में अन्य पुरुष का उपयोग होना चाहिए।

11. पल्लवन में अति विस्तार से भी बचना चाहिए।

हिंदी-भाषा में पल्लवन का महत्व (pallavan ka mahatva)

हिन्दी भाषा में 'पल्लवन' को विचार-शक्ति सुविकसित करने का सशक्त माध्यम माना गया हैं। 'पल्लवन' शब्द 'पल्लव' शब्द से बना है। 'पल्लव' शब्द का अर्थ हैं- वृक्षों के नये पत्ते, जो किसलय (कोपल) अवस्था को पूर्ण कर युवावस्था की विशेषताओं से समन्वित होते हैं। 

आशय यह है कि जिस तरह किसलय की पूर्णता पल्लव-रूप में निहित होती है, उसी तरह कोई भी सुक्ति, विचार या मूल-भाव विविध उदाहरणों, दृष्टान्तों, अन्य सह-भावों तथा विचारों से पुष्ट होता हुआ पल्लवित होता है, तो इस भाषायी क्रिया को 'पल्लवन' कहा जाता हैं। 

'पल्लवन' के अभ्यास से विद्यार्थियों की विचार-शक्ति विकसित होती है, विचारों में परिष्कार तथा परिमार्जन आता है। उनकी कल्पना-शक्ति में विकास होता है एवं जीवन के विविध क्षेत्रों जैसे- सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, आध्यात्मिक, राजनैतिक, साहित्यिक तथा व्यावहारिक (दैनिक जीवन) आदि क्षेत्रों से संबंधित अनुभवों को समझने-समझाने की क्षमता का विकास होता है तथा तत्संबंधी ज्ञान में अभिवृद्धि होती है। इससे लेखन-कौशल तथा भावाभिव्यक्ति के कौशल का विकास होता है। इस तरह पल्लवन से विद्यार्थी में वैचारिक प्रतिभा एवं व्यावहारिक भाषायी कौशलों एवं दक्षताओं का विकास होता है। अतः पल्लवन को विचार-शक्ति को सुविकसित करने का माध्यम मानना उचित ही हैं। इस दृष्टि से हिन्दी-भाषा के सीखने के क्षेसत्र में पल्लवन का विशिष्ट महत्त्व हैं।

पल्लवन के प्रकार (pallavan ke prakar)

पल्लवन कई तरह के कथ्यों का किया जाता है जैसे-- कभी किसी एक शब्द का पल्लवन कराया जाता है, कभी दो या दो से अधिक शब्दों वाले किसी भाव या विचार का पल्लवन कराया जाता है, कभी किसी वाक्य का पल्लवन कराया जाता है, कभी किसी लोकोक्ति या मुहावरे को पल्लवन के लिए दिया जाता है, कभी किसी वार्ता या कथा की रूपरेखाओं का पल्लवन कराया जाता है और कभी कथा या वार्ता के किसी शीर्षक को पल्लवन के लिए दिया जाता है। इन सबकों छः भागों में विभाजित कर सकते है और यह पल्लवन के छः प्रकार कहे जा सकते हैं, जो निम्नानुसार हैं-- 

1. एक शब्द का पल्लवन 

पंचायत, प्रतिभा, वसंत, सहकारिता, मितव्ययिता, पुस्तकालय, सूर्यग्रहण आदि। 

2. दो या दो से अधिक शब्दों का पल्लवन 

राजकीय प्रयोजन, परीक्षा का माध्यम, वैधानिक व्यवस्था, राष्ट्रहित की सिद्धि, मानसिक संकीर्णता, कुसंगति का प्रभाव, प्रात:काल का दृश्य आदि। 

3. एक वाक्य का पल्लवन

बैर क्रोध का आचार या मुरब्बा हैं, श्रद्धा और प्रेम के योग का नाम भक्ति हैं, अहिंसा ही परम धर्म है, मित्रता की कसौटी विपत्ति हैं, सत्य जीवन का धर्म हैं, परिश्रम सफलता की कुंजी हैं आदि। 

4. किसी मुहावरे या लोकोक्ति का पल्लवन 

समरथ को नहिं दोष गुसाई, अधभर गगरी छलकत जाए, होनहार विरवान के होत चीकने पात, सर्व दिन होत न एक समान, थोथा चना बाजे घना, बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद, आप काज महाकाज, परहित सरिस धर्म नहिं भाई, तिल की ओट पहाड़, सावन सूखे न भादों हरे, गड़े मुर्दे उखाड़ना, ईट से ईट बजा देना, मन के हारे हार मन के जीते जीत आदि। 

5. किसी कथा वार्ता की रूप रेखाओं का पल्लवन 

इसके अंतर्गत किसी कथा या वार्ता का कुछ अंश बीच में से छोड़ कर दे दिया जाता है। एक तरह से रिक्त स्थान की पूर्ति जैसा ही यह पल्लवन होता हैं, जैसे किसी हाथी का नित्य तालाब की ओर जाना........मार्ग में दर्जी की दुकान पड़ना.......हाथी का दर्जी की दुकान की ओर सूँड करना.........दर्जी का हाथी की सूँड में सुई चुभोना, हाथी का दर्जी की दुकान में कीचड़ फेंकना। 

6. किसी कथा या वार्ता के शीर्षक का पल्लवन 

खरगोश और कछुआ, लोमड़ी और सारस, बंदर और मगरमच्छ, सावित्री और सत्यवान, तुलसी और सालिग्राम, रूक्मिणी-हरण, पन्नाधाय का त्याग आदि।

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