7/06/2022

चयन का अर्थ, कर्मचारियों के चयन की विधियां

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चयन का अर्थ 

फिलिप्‍पों के अनुसार, ‘‘चयन से आशय भावी कर्मचारियों को खोज करने तथा उपक्रम में काम करने के लिए आवेदन करने हेतु प्रेरणा देने एवं प्रोत्‍साहित करने की विधि से है।‘‘

चयन करना वह क्रिया है जिसके द्वारा काम करने के इच्‍छुक व्‍यक्तियों का पता लगाकर उन्‍हें आवेदन-पत्र देने के लिए प्रोत्‍साहित किया जाता हैं। चयन करने का उद्देश्‍य यह होता है कि पर्याप्‍त संख्‍या में प्रार्थी प्राप्‍त किये जायें। मानव, उत्‍पादन का एक प्रमुख घटक होता है इसलिए इसका चुनाव सावधानीपूर्वक किया जाना चाहिये। श्रमिकों का चुनाव वैज्ञानिक ढंग से किया जाना चाहियें, किसी प्रकार का पक्षपात नहीं किया जाना चाहिए। चुनाव की वैज्ञानिक विधि का किसी उपक्रम के सफल संचालन की दृष्टि से काफी महत्‍व है। भविष्‍य में श्रमिकों एवं कर्मचारियों की कितनी आवश्‍कता होगी, इसका पहले से अनुमान लगा लेना बहुत आवश्‍यक है। 

कर्मचारियों के चयन में ध्‍यान रखने योग्‍य बातें

उपक्रम में कार्य करने हेतु जो भी कर्मचारी नियुक्‍त करने होते है, उनका चुनाव पूर्ण सावधानी से करना चाहिये। यदि चुनाव करते समय थोड़ा-सी भी असावधानी बरती जाती है तो गलत व्‍यक्तियों का चुनाव होने की सम्‍भावना बनी रहती है। कर्मचारी चयन सेविवर्गीय प्रबन्‍धक का यह सबसे महत्‍वपूर्ण कार्य होता हैं जिसमें बहुत ही सावधानी रखने की आवश्‍यकता होती है। कर्मचारियों का चुनाव करते समय निम्‍न बातों का विशेष ध्‍यान रखना चाहिए--

1. कर्मचारियों का चुनाव करते समय व्‍यक्ति विशेष को महत्‍व न देकर उसकी योग्‍यता को विशेष महत्‍व देना चाहियें तथा संगठन की आवश्‍यकताओं के अनुरूप योग्‍यता रखने वाले व्‍यक्तियों का ही चुनाव करना चाहिए। 

2. कर्मचारियों चयन नीति एवं प्रक्रिया सरल होनी चाहिये जो चयनकर्ता तथा अभ्‍यार्थी दोनों को ही आसानी से समझ में आने वाली हों। 

3. कर्मचारी चयन नीति संस्‍था की सामान्‍य सेविवर्गीय नीतियों के अनुरूप हो। 

4. कर्मचारियों का चुनाव का कार्य योग्‍य एवं महत्‍वपूर्ण व्‍यक्तियों को ही सौंपना चाहिये। प्रायः यह कार्य सेविवर्गी प्रबन्‍धक द्वारा ही किया जाना चाहिये तथा जिस विभाग के लिये कर्मचारियों की नियुक्ति की जानी होती है, उसके मुख्‍य अधिकारी को भी सम्मिलित किया जाना चाहिये क्‍योंकि ये दोनों व्‍यक्ति ही इसके लिय अन्तिम रूप से जिम्‍मेदार होते है। 

5. कर्मचारियों के चुनाव करते समय श्रम प्राप्ति या भर्ती के किसी एक ही स्‍त्रोत पर ही निर्भर नहीं रहना चाहिये अपितु आन्‍तरिक एवं बाहृा दोनों ही स्‍त्रोंतों का पूरा-पूरा उपयोग किया जाना चाहिए। 

6. विभिन्‍न स्‍तरों के कर्मचारियों के चयन के लियें एक ही विधि का प्रयोग न करके उनके लिये अलग-अलग विधियों का प्रयोग किया जाना चाहिये। चयन की जो भी विधि काम में लायी जाती है, वह उस श्रेणी के कर्मचारियों के चयन के लिये उपयुक्‍त होनी चाहियें।

7. कर्मचारी चयन की पद्धति लोचपूर्ण होनी चाहियें जिसमें आवश्‍यकता पड़ने पर परिवर्तन किया जाना सम्‍भव हो। 

8. कर्मचारियों का चुनाव करते समय निर्धारित प्रमापों का पालन करना चाहियें तथा उन्‍हीं कर्मचारियों का चुनाव करना चाहिये जिनमें कार्य के अनुरूप योग्‍यता हो। 

9. संगठन की कर्मचारी चुनाव की नीति सरकार की रोजगार नीति के अनुरूप हो। 

10. कर्मचारियों का चुनाव करते समय जिन लोगों का चुनाव नहीं हो पाता है उनके साथ अच्‍छा व्‍यवहार करना चाहिए तथा उनकों हतोत्‍साहित नहीं करना चाहिये। 

11. कर्मचारियों का चुनाव करते समय किसी भी व्‍यक्ति के साथ पक्षपात नहीं करना चाहियें एवं किसी की सिफारिश नहीं माननी चाहिये। 

12. कर्मचारियों के चयन के लिये होने वाले साक्षात्‍कार में सभी कर्मचारियों से एक ही स्‍तर के प्रश्‍न पूछने चाहियें।

13. साक्षात्‍कार के समय कर्मचारियों को हतोत्‍साहित नहीं करना चाहिये। 

14. कर्मचारियों का चुनाव किसी एक व्‍यक्ति द्वारा न किया जाकर चार पॉच व्‍‍यक्तियों के एक समूह द्वारा किया जाना चाहिऐ। 

कर्मचारियों के चयन की विधियाँ

कर्मचारियों के चयन की विधियां निम्नलिखित हैं--

1. नौकरी के इच्‍छुक आवेदनकर्ताओं का आगमन 

यह कर्मचारियों की भर्ती का प्रथम चरण है। इसमें नौकरी चाहने वाले संस्‍था के रोजगार कार्यालय में स्‍वयं उपस्थित होते हैं अथवा आवेदन पत्र देते है।

2. आवेदन-पत्र तथा संलग्‍न प्रमाण-पत्रों की जॉच करना

सामान्‍यतः आवेदन-पत्र के साथ योग्‍यता सम्‍बन्‍धी प्रमाण-पत्र संलग्‍न किये जाते हैं। इनका निरीक्षण करने से यह जानकारी प्राप्‍त की जाती है कि प्रार्थी काम करने योग्‍य हैं अथवा नहीं। 

3. रोजगार सम्‍बन्‍धी परीक्षाएँ

आजकल अधिकांश संस्‍थाएं प्रार्थियों की लिखित परीक्षा भी लेती है। विकासशील देशों में इसका अधिक प्रचलन है। परीक्षाएं बुद्धि के सम्‍बन्‍ध में, रूचि के सम्‍बन्‍ध में, योग्‍यता के सम्‍बन्‍ध में तथा व्‍यक्तित्‍व के सम्‍बन्‍ध में ली जाती है। कुछ संस्‍थाएं व्‍यावसायिक परीक्षण भी करती हैं ताकि यह पता लगाया जा सके कि प्रार्थी उस कार्य के योग्‍य है अथवा नहीं। 

4. रोजगार विभाग द्वारा साक्षात्‍कार 

कुछ संस्‍थाएं लिखित परीक्षा नहीं लेती केवल साक्षात्‍कार लेती है, तो कुछ संस्‍थाएं लिखित परीक्षा के बाद साक्षात्‍कार लेती है। साक्षात्‍कार के लिए संस्‍था में एक निश्चित तिथि पर बुलाया जाता है। साक्षात्‍कार इसलिए लिया जाता है ताकि यह पता लगाया जा सके कि प्रार्थी कार्य के योग्‍य है अथवा नहीं, या कार्य उसके उपयुक्‍त है अथवा नही। एक सफल साक्षात्‍कार कुछ निश्चित सिद्धांतों पर आधारित रहता है। साक्षात्‍कर लेने से पूर्व एक प्रश्‍नसूची तैयार कर लेना चाहियें। प्रार्थी से साक्षात्‍कार लेते समय इस प्रकार के प्रश्‍न नहीं पूछना चाहिये कि वह घबराहट महसूस करे। साक्षात्‍कार के समय कर्मचारी या आवेदनकर्ता की रूचियों एवं योग्‍यता का ज्ञान प्राप्‍त करना चाहिये। वास्‍तव में साक्षात्‍कार एक कला है जिसे हर कोई प्राप्‍त नहीं कर सकता है। 

5. विभाग प्रधान की स्‍वीकृति 

यदि आवेदन करने वाला लिखित परीक्षाओं त‍था साक्षात्‍कारों में सफल हो जाता है तो चुनाव के लिए प्रमुख की स्‍वीकृति प्राप्‍त की जाती है जिसमें पद रिक्‍त हों। 

6. स्‍वास्‍थ्‍य परीक्षण

विभाग प्रधान की स्‍वीकृति प्राप्‍त हो जाने के बाद आवेदन करने वालों का शारीरिक परीक्षण किया जाता है ताकि यह ज्ञान प्राप्‍त किया जा सके कि वह कार्य के लिए शारीरिक दृष्टि से योग्‍य है या नहीं। 

7. नियुक्ति-पत्र भेजना 

स्‍वास्‍थ्‍य परीक्षण में सफल हो जाने के बाद प्रार्थी को नियुक्ति-पत्र भेज दिया जाता है, इसमें नियुक्ति सम्‍बन्‍धी विभिन्‍न शर्तो का उल्‍लेख किया जाता हैं।

8. कार्य का आबंटन 

उपरोक्‍त कार्यवाही के बाद योग्‍यतानुसार कर्मचारी को कार्य दे दिया जाता है। 

कभी-कभी किन्‍हीं कार्यो के लिए कर्मचारियों को प्रशिक्षण भी दिया जाता है, इसके बाद प्रार्थी को उसके कार्य से परिचित कराया जाता है।

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