5/21/2022

सांख्यिकी अनुसंधान का अर्थ, उपयोगिता, चरण

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सांख्यिकी अनुसंधान का अर्थ (sankhyiki anusandhan kya hai)

जब किसी समस्‍या के सम्‍बन्‍ध में सांख्यिकी रीतियों का प्रयोग करते हुए संख्‍यात्‍मक तथ्‍य एकत्रित किए जाते हैं तो उसे सांख्यिकीय अनुसंधान कहा जाता है। सांख्यिकीय अनुसंधान का विषय केवल वही समस्‍यायें बन सकती है जिनसे सम्‍बन्धित तथ्‍यों को संख्‍यात्‍मक रूप में प्रस्‍तुत किया जा सकता हो, जैसे- मूल्‍य वृद्धि की समस्‍या, बढ़ती हुई जनसंख्‍या एवं बेरोजगारी की समस्‍या आदि। वास्‍तव में सांख्यिकीय अनुसंधान के माध्‍यम से किसी समस्‍या के सम्‍बन्‍ध में नये संख्‍यात्‍मक तथ्‍यों की खोज की जाती है। 

सांख्यिकीय अनुसंधान की उपयोगिता 

सांखिकीय की विषय सामग्री समंक ही है। अतः सांख्यिकीय समंकों को प्राप्‍त करना एक महत्त्वपूर्ण कार्य है। ऑकड़ों को प्राप्‍त करके उनका विश्‍लेषण तथा निर्वाचन करने के बाद निष्‍कर्षो के आधार पर प्रतिवेदन तैयार किया जाता है। सांख्यिकीय अनुसंधान के आयोजन का महत्त्व वेटंर व वासरमैन के इन शब्‍दों से प्रकट होता है, ‘‘किसी अनुसंधान में प्राप्‍त समंकों की सार्थकता एवं शुद्धता प्रत्‍यक्ष रूप से उस सावधानी पर निर्भर करती है जिससे अनुसंधान का आयोजन किया जाता है।‘‘

सांख्यिकीय अनुसंधान के चरण

सांख्यिकीय अनुसंधान का विषय हमेशा कोई समस्‍या होती है। किसी समस्‍या के सम्‍बंध में उचित निष्‍कर्ष निकालने के लिए समंक एकत्रित कर लिये जाते है। समंक एकत्रित करने के पूर्व एक योजना का बनाना जरूरी होता है ताकि एकत्रित किए हुए समंक अपने उद्देश्‍यों को पूरा करें अन्‍यथा हमारे समय एवं धन का दुरूपयोग होगा। अगर हम सांख्यिकीय अनुसंधान की कोई योजना नहीं बनायेंगे तो प्राप्‍त होने वाले निष्‍कर्ष गलत एवं भ्रमपूर्ण होगे। सांख्यिकीय अनुसंधान की योजना अनुसंधानकर्ता जितने अच्‍छे ढंग से बनाएगा, उतनी ही अधिक सफलता उसे प्राप्‍त होगी। किसी समस्‍या के सम्‍बन्‍ध में ऑकड़ों को एकत्रित करने के पहले अनेक प्रारम्भिक बातों पर विचार करना पड़ता है। 

संक्षेप में, सांख्यिकी अनुसन्‍धान में निम्‍नलिखित प्रमुख चरणों का उपयोग किया जाता है--

1. समस्‍या के प्रमुख चरण का चयन एवं विश्‍लेषण 

सामाजिक अनुसन्‍धान का प्रथम चरण है, समस्‍या का चुनाव एवं विश्‍लेषण। सर्वप्रथम अनुसन्‍धाकर्ता को उस क्षेत्र तथा विषय का चयन करना होता है, जिसमें वह अनुसन्‍धान करना चाहता है। इस अवस्‍था में अनुसन्‍धानकर्ता को अध्‍ययन सम्‍बन्‍धी समस्‍या का स्‍पष्‍ट ज्ञान नहीं होता। समस्‍या का चयन करने के पश्‍चात् समस्‍या की व्‍याख्‍या की जाती है। उस समस्‍या से सम्‍बन्धित सभी प्रकार के विभिन्‍न तथ्‍यों की छान-बीन की जाती है। इसके लिए समस्‍या से सम्‍बन्धित सभी पुस्‍तकों, विवरणों, सन्‍दर्भ ग्रन्‍थों, पत्र-पत्रिकाओं आदि का अध्‍ययन किया जाता है। इस प्रकार समस्‍या को समझने का प्रयास किया जाता है। 

2. उपकल्‍पना का निर्माण

सामाजिक अनुसन्‍धान का दूसरा चरण है एक कार्यवाहक उपकल्‍पना का निर्माण करना। श्री लुण्‍डबर्ग के शब्‍दों में, ‘उपकल्‍पना एक प्रयोग सम्‍बन्‍धी सामान्‍यीकरण है, जिसकी वैधता की जॉच अभी शेष रहती है।‘ वास्‍तव में उपकल्‍पना के अभाव में किसी भी प्रकार के अनुसन्‍धान की कल्‍पना नहीं की जा सकती है। 

3. तथ्‍यों का अवलोकन एवं संकलन

समस्‍या का चयन एवं उपकल्‍पना निर्माण के पश्‍चात् अनुसन्‍धानकर्ता उन सभी तथ्‍यों का अवलोकन करता है जो उसकी अध्‍ययन वस्‍तु से सम्‍बन्धित समस्‍याओं को समझने में सहायता प्रदान करते है। इस सम्‍बन्‍ध में एक अनुसन्‍धानकर्ता को यह बात विशेष रूप से ध्‍यान में रखनी चाहिए कि वह केवल उन्‍हीं तथ्‍यों का अवलोकन करे जो अध्‍ययन विषय से सम्‍बन्धित है। 

4. तथ्‍यों का वर्गीकरण एवं सरणीयन 

तथ्‍यों के संकलन के पश्‍चात् उनका वर्गीकरण एवं सारणीयककरण करना होता है। संकलन द्वारा प्राप्त तथ्‍यों के ढेर के आधार पर किसी भी प्रकार के निष्‍कर्षो पर नहीं पहॅुचा जा सकता इसलिए उनका उपयुक्‍त श्रेणियों में वर्गीकरण एवं सरणीयन किया जाता है ताकि उनमें निहित प्रतिमानों का पता लगाया जा सकें। 

5. सामान्‍यीकरण

सामाजिक अनुसन्‍धान का पांचवां चरण सामान्‍यीकरण है जिसके अन्‍तर्गत एक अनुसन्‍धानकर्ता उपकल्‍पना, अवलोकन, संकलन तथा वर्गीकरण के आधार पर अध्‍ययन वस्‍तु से सम्‍बन्धित विभिन्‍न नियमों का निर्माण करने के लिये विभिन्‍न पद्धतियों का अनुसरण करता है। 

6. प्रतिवेदन

अन्तिम चरण में सम्‍पूर्ण अनुसन्‍धान प्रक्रम के आधार पर एक नियमबद्ध, संक्षिप्‍त तथा स्‍पष्‍ट प्रतिवेदन प्रस्‍तुत किया जाता है, जिससे इस अनुसन्‍धान का सन्‍दर्भ आगामी अनुसन्‍धानों के लिए सरलतापूर्वक उपलब्‍ध हो सके और इस अनुसंधान की जानकारी इस क्षेत्र के अन्‍य सम्‍बन्धित व्‍यक्तियों को हो सके।

तथ्‍यों का अवलोकन करने के पश्‍चात् अध्‍ययन विषय में सम्‍बन्धित तथ्‍यों को संकलित करना होता है। सामाजिक अनुसन्‍धान में तथ्‍यों का संकलन दो प्रमुख स्‍त्रोतों से किया जाता है--

1. प्राथमिक 

2. द्वैतियक स्‍त्रोत

प्राथमिक स्‍त्रोतों से हमारा अभिप्राय उन स्‍त्रोतों से है, जो अनुसन्‍धानकर्त्ता अपने उपयोग के लिए स्‍वयं संकलित अथवा संग्रह करता है। इनका संग्रहण बिल्‍कुल नये सिरे से किया जाता है। ये समंक पूर्णतः मौलिक होते है और अपनी आवश्‍यकता के अनुसार इनका संग्रहण किया जाता है। द्वैतियक स्‍त्रोत वे हैं जो कि विषय के सम्‍बन्‍ध में पहले से ही एकत्रित तथ्‍यों को प्रदान करते हैं जैसे सरकारी रिकार्ड, व्‍यक्तिगत डायरियां आदि। अध्‍ययन-विषय की आवश्‍यकतानुसार इन सभी स्‍त्रोतों से सूचनाओं का संकलन उपकल्‍पना की वैधता की जांच करने के लिए किया जाता है।

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