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9/22/2021

शिशु विकास का अर्थ, परिभाषा, क्षेत्र, प्रकृति/स्वरूप

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शिशु विकास का अर्थ (shishu vikas kya hai)

मनोवृत्ति व्यवहार का विज्ञान है। ये व्यवहार विकास का परिणाम है। इसलिए शिशु विकास, शिशु की मनोवैज्ञानिकता है है जो बच्चों में व्यवहारिक विकास से संबंधित होती है। अन्य शब्दों मे यह कहा जा सकता है कि शिशु मनोवैज्ञानिकता आवश्यक रूप में शिशु के विकास मे ठीक गर्भ धारण से लेकर किशोरावस्था प्राप्त कर लेने तक सम्मिलित होती हैं। अतः शिशु विकास बच्चे के किशोरावस्था में प्रवेश करने से पहले की स्थिति का वर्णन है। 

शिशु विकास की परिभाषा (shishu vikas ki paribhasha)

शिशु विकास को विभिन्न विद्वानों ने निम्नलिखित प्रकार से परिभाषित किया है-- 

जेम्स ड्रेवर के अनुसार," शिशु मनोविज्ञान, मनोविज्ञान की वह शाखा है जो जन्म से लेकर परिपक्व अवस्था तक मानवीय जीवन के विकास का अध्ययन करती हैं। 

क्रो एवं क्रो के अनुसार," शिशु मनोविज्ञान व्यक्ति के प्रेतृक आरम्भण से लेकर उसकी किशोरावस्था की प्रारंभिक स्थिति तक के विकास का वैज्ञानिक अध्ययन हैं।" 

शिशु विकास का क्षेत्र (shishu vikas ka kshetra)

एक विषय के क्षेत्र का अर्थ इसके अध्ययन का क्षेत्र है। सरल शब्दों मे एक विषय के कार्य क्षेत्र का अर्थ है अध्ययन के वह क्षेत्र जो एक विशेष विषय की योजना में सम्मिलित किये जा सकते हैं। अतः शिशु विकास या शिशु मनोविज्ञान का अर्थ वह विषय-वस्तु जिसका पाठ्यक्रम के एक भाग के रूप में अध्ययन किया जाना हैं। इसके क्षेत्र को निन्म धारणाओं के द्वारा स्पष्ट किया जा सकता हैं-- 

1. शैक्षिक धारणा 

शिशु विकास के क्षेत्र को स्पष्ट करने का सरलतम तरीका शैक्षिक धारणा हैं। शिशु विकास या शिशु मनोविज्ञान का विषय, प्रान्तीय शिक्षा बोर्डों एवं विश्वविद्यालयों द्वारा निर्धारित पाठ्यक्रमों के अध्ययन का एक लोकप्रिय क्षेत्र है। इन शैक्षिक अध्ययनों का शीघ्र अवलोकन हमें शिशु विकास के क्षेत्र का बोध कराता हैं। 

2. वैज्ञानिक धारणा 

शिशु मनोविज्ञान के क्षेत्र में विशेषज्ञों ने मानवीय विकास के व्यवस्थित अध्ययन में योगदान दिया हैं। उन्होंने शिशु विशेषज्ञों, चिकित्सक मनोविज्ञानियों एवं अन्यों की शोध एवं खोजों द्वारा सुझाये गये रूचिकार विषयों को शिशु मनोविज्ञान या शिशु विकास मे सम्मिलित करके इसकी विषय-वस्तु के क्षेत्र को प्रबल बना दिया हैं।

शिशु विकास का स्वरूप या प्रकृति 

शिशु विकास का स्वरूप या प्रकृति को निम्नलिखित प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता हैं-- 

1. शिशु विकास एक व्यवस्थित अध्ययन है 

शिशु विकास, बच्चों के व्यवहार का व्यवस्थित अध्ययन है जब तक कि वह किशोर अवस्था तक नही पहुँचते। 

2. शिशु विकास एक सकारात्मक विज्ञान हैं

शिशु विकास अथवा शिशु मनोवृत्ति एक सकारात्मक विज्ञान है। यह बच्चों के विकास का वैज्ञानिक अध्ययन करता हैं। निम्नलिखित कारणों से यह सकारात्मक विज्ञान हैं-- 

1. यह वास्तविक तथ्यों का अध्ययन करता हैं। 

2. यह वैज्ञानिक विधियों जैसे अवलोकन, प्रयोग आदि का प्रयोग करता हैं। 

3. इसके आधारभूत परिणाम विस्तृत रूप में लागू करने योग्य होते हैं। 

4. यह मान्य परिणाम उपलब्ध करवाता हैं। 

5. किसी भी तर्क-संगत विज्ञान की भाँति शिशु मनोविज्ञान भी घटना की भविष्यवाणी कर सकता हैं। 

3. एक स्वतंत्र विज्ञान 

शिशु विकास अथवा शिशु मनोविज्ञान एक स्वतंत्र मनोविज्ञान है। इस रूप में, शिशु मनोविज्ञान विशेष अध्ययन के क्षेत्र के संबंध में अपने ही सामान्य नियमों की खोज करता हैं। हितकर परिणामों की प्राप्ति के लिये, इन नियमों को लागू करने के लिये यह कार्य योजना का सुझाव भी देता हैं। 

4. मानवीय प्रकृति का शुद्धतम विज्ञान 

शिशु विज्ञान, मानवीय प्रकृति का शुद्धतम विज्ञान हैं। एक शिशु मनोवैज्ञानिक, बच्चे के स्वरूप को इसके सच्चे और शुद्ध रूप में देखता तथा विश्लेषण करता है। प्रत्येक वस्तु जब प्रकृति के लेखकों के हाथ से आती हैं तो शुद्ध होती हैं। आदमी (वयस्क) इसमें हस्ताक्षेप करके इसे दूषित कर देता हैं। एक शिशु मनोवैज्ञानिक की मुख्य रूचि, शिशु प्रकृति को इसके वास्तविक रूप में देखने में होती हैं न कि आदमी द्वारा परिभाषित रूप में।

5. शिशु मनोविज्ञान/विकास पूर्णतया विकासात्मक मनोविज्ञान नही हैं 

यह स्पष्ट है कि शिशु मनोविज्ञान अथवा शिशु विकास, विकासात्मक मनोविज्ञान नही हैं। पूर्व-कथित शिशु का जन्म-पूर्व से लेकर किशोर अवस्था से पहले तक के समय का अध्ययन हैं। जबकि पश्चात्-कथित व्यक्ति के जन्म से लेकर मृत्यु तक के विकास का अध्ययन हैं। 

6. शिशु विकास, विकास में निरन्तरता की अपेक्षा रखता हैं 

शिशु मनोविज्ञान अथवा शिशु विकास, विकास प्रक्रिया में निरन्तरता की अपेक्षा रखता हैं। आने वाले विकास को पहले जा चुकी स्थिति से जोड़ा जाता हैं। शिशु विकास परिवर्तनों का पहले जा चुके परिवर्तनों के संदर्भ में अध्ययन करता हैं। 

7. बच्चे के सामान्य स्वास्थ्य विकास के लिये कदम उठाना 

मनोरंजन के अनेक साधनों जैसे-- सिनेमा, दूरदर्शन, पाॅप म्यूजिक आदि की उपस्थित में बढ़ती हुई आयु के बच्चे कुछ अवांछनीय तत्वों की ओर अनावृत्त होते हैं। यह अवांछनीय तत्व बच्चों के सामान्य, स्वास्थ्य शारीरिक, भावात्मक, सामाजिक एवं बौद्धिक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं। शिशु मनोविज्ञान का ज्ञान, बच्चों को ठीक मार्ग पर रखने के लिए माता-पिता का पथ-प्रदर्शन करेगा। माता-पिता बच्चे को अच्छा जीवन व्यतीत करने और सामान्य एवं स्वास्थ्य व्यक्ति के रूप में विकसित होने की शिक्षा दे सकते हैं। 

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