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8/15/2021

बंधुओं मजदूर किसे कहते है?

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बंधुओं मजदूर किसे कहते हैं? बंधुओं मजदूर की समस्या पर निबंध 

गाँवों मे मुख्यतया कृषि कार्य ही किया जाता है। कृषि कार्य करने के लिए यह आवश्यक नही है कि सभी ग्रामीणों के पास अपनी स्वयं की जमीन हो। कृषि कार्य करने वाले लोगों के मध्य मुख्य अंतर भूमि स्वामी एवं श्रमिक के रूप मे होता है। भूमि स्वामी जमिन का मालिक होता है तथा वह कम से कम कम अपनी जमीन पर करता है तथा श्रम से संबंधित अधिकांश कार्य मजदूरों से कयवाता है। बटाई से कृषि कार्य करवाने की प्रथा हमारे देश में है। इसके अंतर्गत किसान अपनी संपूर्ण भूमि या कुछ भूमि बटाई पर दे देता है। इसके बदले बटाईदार या तो कुछ किराया भूमि स्वामी को प्रदान करता है या फिर फसल का आधा हिस्सा वह बटाईदार से ले लेता है।

मजदूर अपनी जीविका उपार्जन के लिए कृषि मजदूरी करते है या भूमि स्वामियों के खेतों पर शारीरिक श्रम करते हैं और अपना जीवन निर्वाह करते हैं। सामान्यता गांवों में दो प्रकार के मजदूर पाए जाते हैं कृषि कार्य मजदूरी करने वाले श्रमिक एवं गैर कृषि कार्य करने वाले मजदूर। कृषि कार्य करने वाले मजदूर सामान्यता रोजंधारी पर कार्य करते हैं जब कृषि कार्य नहीं होता है उस समय यह अपने जीवन निर्वाह के लिए अन्य प्रकार की मजदूरी करते हैं या शहरों की ओर पलायन करते हैं। दूसरे और गैर कृषि कार्य करने वाले मजदूर वर्ष भर कृषि कार्य के अतिरिक्त अन्य मजदूरी ही करते हैं।

बंधुआ मजदूरी प्रथा सामान्यता ऋण के बदले में व्यक्ति के श्रम को गिरवी रखने की प्रथा है। इसके अंतर्गत ऋण लेने वाला व्यक्ति अपने आप को या अपने परिवार के किसी सदस्य को ऋणदाता के पास तब तक गिरवी रख देता है जब तक कि उसका कर्ज उतारना जाता है। इस अवधि में ऋणदाता उस गिरवी रखे हुए व्यक्ति से श्रम करवाता रहता है और उसे कोई पारिश्रमिक नहीं दिया जाता है। बंधुआ मजदूर को मात्र सामान्य भोजन दिया जाता है। बंधुआ मजदूरों से घर के बाहर एवं घर के अंदर के दोनों ही कार्य करवाए जाते हैं। घर के भीतर के कार्य के लिए सामान्यता महिला मजदूरों को रखा जाता है और बाहर के कार्यों के लिए पुरुष मजदूरों को रखा जाता है। इन मजदूरों से घर की सफाई पशुओं की देखभाल से संबंधी कार्य आदि करवाए जाते हैं। बंधुआ मजदूर को तब तक ऋणदाता के पास कार्य करना होता है जब तक कि उसके द्वारा या उसके परिवार के किसी सदस्य द्वारा लिया गया कर्ज संपूर्ण रूप से ब्याज सहित अदा नहीं कर दिया जाता। इस प्रथा के अंतर्गत ऋणदाता द्वारा बंधुआ मजदूर का पूर्ण रूप से शोषण किया जाता है। उससे अधिक से अधिक श्रम करवाया जाता है और पारिश्रमिक भी नहीं दिया जाता है। कहीं कहीं अधिक कार्य करने पर बंधुआ मजदूर को अध्ययन न्यूनतम श्रमिक मिलता है। जो उसके कार्य के अनुरूप नहीं होता है और यह राशि भी ऋणदाता अपने पास ही रखता है और कर्ज की राशि में उसका समायोजन करता रहता है। इस प्रथा में ब्याज की गति तेजी से बढ़ती रहती है और लेने वाला व्यक्ति उच्च गति से कार्य नहीं कर पाता परिणामस्वरुप बंधुआ मजदूरी से मुक्त होने में उसे बरसो लग जाते हैं और कभी-कभी तो यह पीढ़ी दर पीढ़ी चलता ही रहता है।

बंधुआ मजदूरी को समाप्त करने हेतु संविधान की धारा 23 के अंतर्गत बंधुआ मजदूर को जबरन श्रम को निषेध किया गया है। मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में बंधुआ मजदूर रखने वाले व्यक्ति को 3 वर्ष की सजा अथवा ₹1000 के जुर्माने का प्रावधान किया गया है। किंतु यह नियमों एवं कानूनों का पालन कर पाना संभव नहीं होता है व्यवहारिक रूप में कर्ज लेने वाला व्यक्ति कर्ज लेते समय कर्ज दाता की संपूर्ण शर्तों को मान लेता है। इस प्रकार बंधुआ मजदूरी करने के लिए उसकी अपनी स्वयं की सहमति होती है ऋणदाता द्वारा जब अधिक प्रताड़ित किया जाता है तभी वह इसका विरोध करता है।

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