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6/13/2021

ध्वनि विज्ञान क्या है? उपयोगिता/महत्व

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ध्वनि विज्ञान क्या है? (dhvani vigyan kise kehte hain)

dhvani vigyan arth mahatva;ध्वनि विज्ञान का अर्थ है-' ध्वनेः विज्ञानम् ध्वनिविज्ञानम्'  यानी की जिसमें ध्वनि का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाए वह ध्वनि विज्ञान है।  इसके लिए अंग्रेजी मे दो शब्द प्रचलित है-- (अ) फोनोलाॅजी, (ब) फीनेटिक्स।

Phoone शब्द का अर्थ है-- ध्वनि। Logy व tics ये दोनों प्रत्यय विज्ञान के लिए प्रयुक्त है। आधुनिक विज्ञानों ने ध्वनि विज्ञान का पर्यायवाची 'स्वनिम' व 'स्वनिमी' भी किया है। परन्तु ध्वनि विज्ञान के लिए अंग्रेजी का phonetic शब्द ही अधिक लोकप्रिय है। फोनेटिक्स के अंतर्गत ध्वनि की परिभाषा, भाषा संबंधी ध्वनियों का विवेचन, ध्वनियों के उत्पादन वाक्यन्त्र, ध्वनि का उद्भव-विकास, ध्वनि नियम इत्यादि आते है। ध्वनि का अर्थ प्रत्येक आवाज नही है, बल्कि वह सार्थक आवाज या ध्वनि है जिसका भाषा मे प्रयोग किया जाता है। भाषा के दो रूप है-- (अ) ध्वन्यात्मक (ब) लिखित। 

लिखित रूप ध्वन्यात्मक व उच्चारण के आधार पर प्रस्तुत है और उपयोगी है। उच्चारण के बिना भाषा का लिखित रूप कुछ भी अर्थ नही रखता अर्थात् व्यर्थ है।

वस्तुतः ध्वनि भाषा का मूल आधार है क्योंकि ध्वनि चिन्ह ही भाषा को अभिव्यक्त करते है। ध्वनि विज्ञान प्रत्येक ध्वनि का विज्ञान नही, बल्कि निरर्थक ध्वनियों उसके अध्ययन क्षेत्र मे नही आती है। मानव अपने भावों की अभिव्यक्ति के लिए जिन भाषिक ध्वनियों का प्रयोग करता है वे ध्वनियां ही भाषा विज्ञान के लिए अपेक्षित है। ध्वनि का उत्पादन वक्का द्वारा होता है व उसका श्रवण श्रोता द्वारा होता है। ध्वनि का आधार वायु है। ध्वनि वक्का के मुख से निकल कर वायुतरंगों के माध्यम से श्रोता की कर्णोन्द्रिय तक पहुंच जाती है। 

भाषा यदि विचारों के आदान-प्रदान का साधन है तो उसका कार्य ध्वनि के माध्यम से होता है। प्राचीनकाल मे ध्वनियों का अध्ययन व्याकरण के माध्यम से होता था। शिक्षा शास्त्र व प्रतिशाख्य भी ध्वनि की जानकारी देते थे। संस्कृत वैयाकरणों का स्फोटवाद ध्वनि के आधार पर ही प्रचलित था। वैयाकरणों के अनुसार 'ध्वनि' शब्द ध्वन् धातु से इन प्रत्यय लगाकर बना है। ध्वन्  धातु शब्द करने के अर्थ मे प्रयुक्त है। कोश मे भी ध्वनि का अर्थ शब्द आवाज व नाद आदि अर्थों मे प्रयुक्त है। इस प्रकार ध्वनि विज्ञान ध्वनियों का विज्ञान है। अतः ध्वनि विज्ञान की परिभाषा इस प्रकार की जा सकती है-- 

" जिस शास्त्र मे मानव के वाक्यन्त्र से उच्चरित सार्थक ध्वनियों का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाता है उसे ध्वनि विज्ञान कहते है।"

ध्वनि विज्ञान की उपयोगिता/महत्व 

dhvani vigyan ka mahatva;ध्वनि भाषा की आधारशिला है। भाषा के अत्यावश्यक तत्वों व अंगों मे ध्वनि की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। भाषा मे चाहें पद हों या वाक्य, अर्थ हो या भाव-सभी का संबंध ध्वनि से है क्योंकि ध्वनि के बिना इनका अस्तित्व नही। विचारों का आदान-प्रदान ध्वनि के माध्यम से ही संभव है। ध्वनि का अर्थ ताली बजाना, चुटकी बजाना, आंखों से संकेत करना, चिल्लाना, सिटी या हाथों आदि अंगों के संकेत से नही है। वाक् यंत्र से जो ध्वनि सार्थक रूप मे विचाराभिव्यक्ति के लिए प्रस्तुत की जाती है वही ध्वनि उपयोगी है। ध्वनि विज्ञान के लिए उसकी उपयोगिता है। अतः ध्वनि विज्ञान की उपयोगिता इसी आधार पर इस प्रकार प्रस्तुत की जा सकती है--

1. ध्वनि विज्ञान भाषा की विभिन्न ध्वनियों का ज्ञान करना है। भाषा के अशुद्ध व शुद्ध उच्चारण को बताकर मानव को शिक्षित बनाना है। भाषा के शुद्ध उच्चारण की शिक्षा देना ध्वनि विज्ञान का कार्य है। महाभाष्य मे यहाँ तक कहा गया है--

" एक शब्द सम्यक् ज्ञातः शास्त्रान्वितः सुप्रयुक्तः स्वर्गे लोके च कामधुग् भवति यानि की यदि शब्द का विशुद्ध ज्ञान हो और उसका उचित प्रयोग किया जाए तो वह इस लोक व परलोक मे मनोकामना पूर्ण करने वाला होता है।

2. ध्वनि विज्ञान ही बताता है कि वाक्यन्त्र के किस भाग से कौनसा वर्ण उच्चरित होता है। तभी यह ज्ञात होता है कि क्रम-कर्म, सकल-शकल, चिता-चिंता आदि के उच्चारण करने मे शब्दों का किस प्रकार अर्थ बदल जाता है। शुद्ध उच्चारण व अशुद्ध उच्चारण का ज्ञान मानव-जीवन के लिए आवश्यक है जो ध्वनि विज्ञान से ही संभव है।

3. ध्वनि विज्ञान ही संसार की विभिन्न भाषाओं के ज्ञान के लिए उपयोगी है। प्रत्येक भाषा के ध्वन्यात्मक चिन्ह अलग-अलग है। यही कारण है कि प्रत्येक भाषा की वर्णमाला अलग-अलग है। ध्वनि विज्ञान प्रत्येक भाषा के उच्चारण की शिक्षा देता है।

4. ध्वनि विज्ञान भाषा के लेखन मे भी उपयोगी है। पहले ध्वनि विज्ञान के माध्यम से भाषा का उच्चारण ठीक प्रकार से ज्ञात किया जाता है तत्पश्चात वर्णों का सूक्ष्म ज्ञान प्राप्त करके लिपि-चिन्हों की अदनुरूप पहचान की जाती है तथा लिखा जाता है। शुद्ध लेखन के लिए शुद्ध ध्वनि या उच्चारण अत्यन्त आवश्यक है।

5. ध्वनि विज्ञान से ध्वनियों का सूक्ष्म ज्ञान करके उनके पारस्परिक अंतर को समझा जाता है। जैसे-- वाक्+दान = वाग्दान क्यों बना? सत्+जन से सज्जन क्यों बना? इत्यादि ध्वनियों के परिवर्तन का यथोचित ज्ञान किया जाता है।

6. ध्वनि विज्ञान ही हमे बताता है कि आज जो तद्भव रूप है, वे पहले तत्सम किस प्रकार थे? उनका विकास कैसे हुआ? जैसे-- दुद्ध- दुध्ध- दूध मे किस प्रकार ध्वनियाँ धीरे-धीरे विकसित होकर तत्सम से तद्भव शब्द बन गया।

7. ध्वनि विज्ञान से ही हम प्राचीन भाषा को ज्ञात कर सकते है। नवीन भाषा का प्राचीन भाषा से विकास किस प्रकार हुआ- यह ध्वनि विज्ञान पर ही निर्भर करता है।

8. ध्वनि विज्ञान ही शब्दों के बिगड़ते-बनते रूपों की जानकारी देता है। जैसे-- पहले वैदिक वर्णमाला में लृ, ठ्ठ आदि वर्ण थे, परन्तु इनका उच्चारण कठिन होने के कारण इनका धीरे-धीरे लोप हो गया। ॠ (अर्थात ॠ का दीर्घरूप) अब नही रहा।

9. ध्वनि विज्ञान के माध्यम से ही आज देवनागरी लिपि के अनुनासिक वर्ण (ड़, ञ, ण्, न्, म्) आधुनिक हिंदी मे अनुस्वार के रूप मे प्रयोग किए जाने लगे है। जैसे--, अड़्क- अंक, अञ्जन- अंजन, घण्टा-, घंटा, तंत्र, पम्पा, पंपा इत्यादि।

10. ध्वनि विज्ञान से ही विदेशी व स्वदेशी भाषाओं की समानता और असमानता ज्ञात होती है, तथा उनके पारस्परिक संबंधो का ज्ञान भी होता है। जैसे-- अंग्रेजी के two- दो, seven- सात, Flower- फूल, इसी प्रकार अन्य भाषाएं है जो भारतीय भाषाओं से किन्ही रूपों मे समानताएं व किन्ही रूपों मे असमानताएं रखती है।

11. ध्वनि विज्ञान में संसार की समस्त  भाषाओं का ध्वन्यात्मक अध्ययन किया जाता है। यही कारण है कि आज सम्पूर्ण विश्व एकता के सूत्र मे बंध गया है। एक देश दूसरे की विविध, सफल व सरल प्रणालियों को अपनाने लगा है। जैसे-- कम्प्यूटर जैसे यंत्र सभी देश भाषा की दृष्टि से प्रयोग करने लगे है।

12. ध्वनि विज्ञान से ही मानव को प्रगति के पथ पर बढ़ने की प्रेरणा मिली है। प्रत्येक मानव भाषा के ध्वन्यात्मक रूप से शिक्षित होना चाहता है। प्रत्येक देश चाहता है कि उसके अधिक से अधिक नागरिक शिक्षित हों। वो अपने देश की भाषा को तो सम्यक् प्रकार बोल ही सकें, साथ ही, अन्य भाषाओं का भी ज्ञान कर सकें।

13. ध्वनि विज्ञान ही हमें बताता है कि प्रत्येक भाषा की वर्णमाला अलग-अलग है। देवनागरी लिपि मे त, थ, द, आदि दन्त्यवर्ण अंग्रेजी भाषा मे नही है वहां ट, ठ, ड, ढ आदि वर्ण इनके स्थान पर प्रयोग होते है। भाव  यह है कि ध्वनि विज्ञान भाषाओं के पारस्परिक अंतर को स्पष्ट करके इनके अंतर के कारणों की भी खोज करता है।

14. ध्वनि विज्ञान ही बताता है कि किस वाक्यंत्र से कौनसी ध्वनि निकलती है। इससे उच्चारण करने वाला उन ध्वनियों को सहज ही बोलने मे सक्षम होता है।

15. ध्वनि विज्ञान ही ध्वनियों का वर्गीकरण करता है तथा उनके सूक्ष्म रूप का ज्ञान कराता है।

16. ध्वनि विज्ञान के माध्यम से ध्वनि गुणों का अध्ययन किया जाता है तथा उनकी सार्थकता का ज्ञान किया जाता है।

17. भाषा मे ध्वनियों के परिवर्तन के कारणों की खोज करना ध्वनि विज्ञान का ही दायित्व है। ध्वनि विज्ञान से ही ज्ञात होता है कि स् को श् क्यों बोला जाता है अथवा किस कारण श् को स् के रूप मे उच्चरित किया जाता है।

18. ध्वनि विज्ञान ही बताता है कि शब्दों मे आगम, लोप, विपर्यय, समीकरण, विषमीकरण आदि किस प्रकार के हो जाते है। जैसे-- स्वप्न-सपना, स्त्री-इस्त्री, अनाज-नाज, वार्ता-बात नाककटी-नकटी, काक-काग, शगुन-शकुन रूप क्यों उच्चरित होने लगे है। 

19. ग्रिम, ग्रासमैन, वर्नर आदि प्रसिद्ध भाषा- वैज्ञानिकों ने ध्वनि नियम बनायें है उन्होंने देखा कि भाषा मे नियमित ध्वनि विकार पाए गए जो किसी विशेष काम व विशेज्ञ परिस्थितियों मे हुए थे। उनकी दृष्टि मे ध्वनि नियम का अर्थ है--

A phonetic law of language is a statement of the regular practice of the language at a particular time in regard to a treatment of a particular sound or group of sounds in a particular setting.

अर्थात किसी भाषा के ध्वनि नियम का अर्थ है उस भाषा मे होने वाले वे नियमित ध्वनिविकार जो किसी विशिष्ट कालखण्ड मे तथा विशिष्ट परिस्थितियों मे विशेष ध्वनियों से संबंधित होते है। इस प्रकार के ध्वनि नियमों से संसार की अनेक भाषाओं के अध्ययन करने और उनकी विशेष जानकारी प्राप्त करने मे पर्याप्त लाभ होता है। इस प्रकार ध्वनि विज्ञान भाषा की विविधमुखी जानकारी देने, संसार की भाषाओं का ज्ञान कराने, भाषा के विशुद्ध रूप को बताने आदि मे अत्यन्त उपयोगी है। इसी कारण भाषा की अन्य शाखाओं मे ध्वनि विज्ञान महत्वपूर्ण माना जाता है।

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