har din kuch naya sikhe

हर दिन कुछ नया सीखें।

6/07/2021

अपक्षय किसे कहते हैं? प्रकार, महत्व

By:   Last Updated: in: ,

अपक्षय किसे कहते हैं? (apakshay kya hai)

apakshay arth prabhavit krne vale karak prakar mahatva;चट्टानों के अपने ही स्थान पर टूटने-फूटने की क्रिया को अपक्षय कहते है। इस प्रकार अपक्षय एक स्थैतिज (Static) क्रिया है जिसमे पदार्थों का परिवहन सम्मिलित नही है। चट्टानों के अपने ही स्थान पर टूटने की क्रिया दो प्रकार से होती है--

(अ) भौतिक कारकों द्वारा बलकृत रूप से (Mechanical) चट्टानों का टूटना या विघटन (Decomposition)।

(ब) रासायनिक प्रक्रिया द्वारा चट्टान का कमजोर होकर बिखर जाना या अपघटन (Decomposition)।

स्पार्क के अनुसार," पृथ्वी की सतह पर प्राकृतिक कारकों द्वारा चट्टानों का अपने ही स्थान पर यान्त्रिक विधि द्वारा टूटने अथवा रासायनिक वियोजन होने की क्रिया को अपक्षय कहा जाता है।" 

अपक्षय को प्रभावित करने वाले तत्व 

अपक्षय के प्रकार और उसकी दर को प्रभावित करने वाले चार प्रमुख तत्व है--

1. शैल संरचना 

शैल संरचना एक व्यापक शब्द है जिसमें चट्टान के भौतिक और रासायनिक गुण, खनिजीय संघटन, जोड़, संस्तरण का स्वरूप आदि अनेक पक्ष सम्मिलित है। शैल संरचना का अपक्षय पर कई दृष्टि से प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है, उदाहरणार्थ, आग्नेय शैलों पर भौतिक की अपेक्षा रासायनिक प्रतिक्रिया का अधिक प्रभाव पड़ता है, चूने की चट्टान उष्ण आर्द्र जलवायु मे घुल जाती है, अधिक जोड़ वाली चट्टान मे अपक्षय की गति तीव्र होगी, आदि।

2. जलवायु

तापमान और आर्द्रता सरीखे जलवायवी तत्व न केवल अपक्षय की गति को निर्धारित करते है वरन् यह भी निश्चित करते है कि भौतिक और रासायनिक प्रक्रियाओं मे से किसका प्राधान्य रहेगा। उदाहरणार्थ, उच्च अक्षांशीय और ऊँचे पर्वतीय क्षेत्रों में तुषार क्रिया महत्वपूर्ण है, उष्ण मरूस्थलीय जलवायु मे क्रिस्टलीय वृद्धि और तापमान का अधिक महत्व है, जबकि ऊष्ण-आर्द्र जलवायु मे रासायनिक अपक्षय का प्राधान्य है।

3. स्थलाकृति 

ढाल का प्रत्यक्ष प्रभाव इस बात पर पड़ता है कि चट्टानों पर कितना वनस्पति और मिट्टी का आवरण टिकेगा। अधिक तीव्र ढाल वाले भाग वनस्पति विहीन और मिट्टी विहीन होते है, जिन पर अपक्षय अधिक तीव्रता से होता है।

स्थलाकृति अप्रत्यक्ष रूप से भी अपक्षय को प्रभावित करती है क्योंकि स्थलाकृति का प्रत्यक्ष संबंध तापमान और वर्षा से है।

4. वनस्पति 

वनस्पति के आवरण की बहुलता और किस्म से अपक्षय का प्रकार और दर निर्धारित होती है, क्योंकि वनस्पति आवरण से ही चट्टानों के खुलेपन का तथा कार्बन डाय ऑक्साइड एवं ह्रूमिक अम्ल की उस मात्र का निर्धारण होता है जो कि वनस्पति के सड़ने से प्राप्त होगी।

अपक्षय के प्रकार (apakshay ke prakar)

अपक्षय के ताप, जल, पवन आदि प्राकृतिक बल भू-पृष्ठ की शैलों पर प्रभाव डालकर तोड़ते-फोड़ते है। अपक्षय सभी नवीन व पुरानी शैलों पर होता है जिसमे वह चूर-चूर होकर मिट्टी मे परिवर्तित होता रहता है। अपक्षय तीन प्रकार का होता है--

1. भौतिक या यांत्रिक अपक्षय 

भौतिक अपक्षय से चट्टानें बिना किसी रासायनिक क्रिया से विघटित हो जाती है। ऐसी कई प्रक्रियाएं है जो चट्टानों के विघटन मे सहायक है। इसके अतिरिक्त वर्षा तथा वायु भी अपक्षय मे सहायक होते है।

(अ) सूर्य ताप 

सूर्य ताप से दिन मे शैलें गर्म होकर फैलती है और रात्रि मे ठंडक पाकर सिकुड़ती है। इससे शैलों की ऊपरी पर्तें कमजोरी होकर चटकने लगती है और टूटने लगती है तथा दबाव और खिंचाव के कारण उनमे दरारें पड़ जाती है। दरारों मे जल भर जाता है और रात्रि मे भीषण ठंड द्वारा हिमीभूत होकर जल अपना आयतन बढ़ा लेता है। इस प्रकार चट्टानें चटक जाती है।

(ब) पाला या बुखार 

बड़े-बड़े गड्ढों या दरारों मे जल भर जाता है। रात्रि मे बहुत अधिक ठंड होने से वह जल हिम मे परिवर्तित हो जाता है। जब उसका आयतन बढ़ता है और दिन मे पुनः पिघल जाता है। इस क्रिया के लगातार होने से चट्टानों मे दरारें चौड़ी हो जाती है।

(स) वर्षा 

गर्मी के दिनों मे सूर्य के अत्यधिक ताप से पृथ्वी की लगभग सभी चट्टानें फैल जाती है। जब अचानक रात्रि के समय वर्षा होती है तो शैल ठंडी होकर सिकुड़ती है। इस क्रिया मे वे चटक जाती है। उत्तरी अमेरिका के टैक्सास राज्य मे यह क्रिया बहुत होती है।

(द) पवन 

पवन अपक्षय एवं अपरदन का महत्वपूर्ण साधन होती है। तीव्र पवन के झोंके बालू के मोटे कणों को साथ लेकर जब शैलों से टकराते है तो उन्हें घिस देते है। इस प्रकार निरंतर घिसाव की क्रिया होने से शैलों का विखंडन हो जाता है। पवन अपघर्षण, सन्निवर्षण तथा अपवाहन द्वारा यह क्रिया करती है।

2. रासायनिक अपक्षय 

शैलों के तत्व जब रासायनिक तत्वों के साथ क्रिया करते है तो उसे रासायनिक अपक्षय कहते है, अर्थात् ऑक्सीजन, कार्बन-डाई-डाइऑक्साइड, हाइड्रोजन, नाइट्रोजन इत्यादि गैसें रासायनिक अपक्षय का महत्वपूर्ण साधन है। रासायनिक अभिक्रियाओं द्वारा शैलों के संगठन एवं संरचना मे परिवर्तन हो जाता है, शैलें टूट जाती है। यह क्रिया निन्म प्रकार से होती है--

(अ) ऑक्सीकरण 

शैलों मे उपस्थित लोहांश जब ऑक्सीजन गैस के संपर्क मे आता है तब रासायनिक क्रिया के फलस्वरूप लोहे के कण ऑक्साइडों मे परिवर्तित हो जाते है। इस प्रतिक्रिया के फलस्वरूप उनका आयतन बढ़ जाता है। आयतन बढ़ने से शैलों का संगठन ढीला पड़ जाता है तथा उनका अपक्षय हो जाता है। इस प्रक्रिया मे चट्टानें शीघ्रता से गल जाती है। शैलों मे रंग की भिन्नता ऑक्सीकरण क्रिया के कारण ही होती है।

(ब) कार्बनीकरण 

कार्बन-डाई-डाइऑक्साइड गैस पानी के साथ क्रिया कर कार्बोनिक अम्ल को उत्पन्न करती है। यह अम्ल शैलों मे पाए जाने वाले चूने के अंश वाली चट्टानों को घोल देता है, जिससे कैल्शियम कार्बोनेट का निर्माण होता है। इस प्रकार शैलों का संगठन निर्बल पड़ जाता है तथा वे घुलकर टूट जाती है।

(स) जलयोजन

जल मे हाइड्रोजन गैस उपस्थित रहती है जैसे ही यह गैस शैलों के संपर्क मे आती है, उन पर बहुत अधिक दबाव पड़ता है, जिसके कारण उनमे उपस्थित खनिज लवण चूर्ण-चूर्ण हो जाते है तथा शैलों के स्तर उखड़ने लगते है। इस प्रकार जलयोजन से अपक्षय की क्रिया होती रहती है।

(द) घोलीयकरण

वर्षा का जल लवणयुक्त होता है। ये लवण शैलों को अपने मे घोल लेते है। जल घुले हुए पदार्थों को अपने साथ बहाकर ले जाता है तथा अन्यत्र स्थनों पर जमा कर देता है जिससे शैलों मे विखंडन उत्पन्न हो जाता है। अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में यह क्रिया बहुत तेजी से होती है।

3. जैविक अपक्षय 

अपक्षय की क्रिया मे जैविक तत्वों का भी सहयोग रहता है। मनुष्य, जीव-जंतुओं तथा वनस्पति द्वारा किया गया अपक्षय, जैविक अपक्षय कहलाता है। यह निम्न प्रकार का होता है--

(अ) जीव-जंतुओं द्वारा अपक्षय 

अनेक जीव-जंतु (लोमड़ी, गीदड़, केंचुए, दीमक, बीजू, सोहू आदि) शैलों मे बिल बनाकर रहते है। उनके द्वारा खुदी हुई मिट्टी को जल, वायु, हिमानी बहाकर ले जाती है, जिससे शैलों का अपक्षय हो जाता है। जीव-जंतुओं द्वारा भौतिक तथा रासायनिक दोनों ही प्रकार का अपक्षय होता है।

(ब) पौधों द्वारा 

पेड़ों की जड़े शैलों के नीचे बढ़कर इनमें दरार पैदा करती है, इससे शैलें चटक (टूट) जाती है।

(स) मनुष्यों द्वारा 

मानव सुरंग बनाता है, खान खोदता है, वनों को काटता है इससे शैलें विघटित होती है।

अपक्षय का महत्व/लाभ (apakshay ka mahatva)

अपक्षय अनाच्छादन की एक आरंभिक परन्तु अत्यंत महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। मिट्टी जो कि पृथ्वी पर मानवीय जीवन का आधार है, मूलतः अपक्षय द्वारा ही निर्मित होती है। अपक्षय के महत्व को संक्षेप मे निम्नलिखित चार बिन्दुओं के रूप मे व्यक्त किया जा सकता है--

1. द्रव्यमान संचालन और अपरदन मे सहायक 

मलबे के निर्माण मे अपक्षय की एक महत्वपूर्ण भूमिका है। यही मलबा द्रव्यमान संचालन और अपरदन द्वार स्थानांतरित होता है। इस प्रकार अपक्षय द्रव्यमान संचालन और अपरदन मे सहायक है।

2. सतहों का निम्नीकरण 

कुछ क्षत्रों मे विशेषतः वहाँ जहाँ चूने, डोलामाइट अथवा जिप्सम का आच्छादन है, अपक्षय द्वारा सतहों का निम्नीकरण होता है।

3. स्थलाकृतियों का निर्माण 

अपक्षय द्वारा अपशिल्कन गुम्बद (Exfoliation domes), स्क्री, टेलस, विलय छिद्र (Solution holes), प्रस्तर वलय (Stone rings) आदि अनेक स्थलाकृतियों का प्रत्यक्ष रूप से निर्माण होता है।

4. मिट्टी का निर्माण 

मिट्टी के निर्माण, उसके स्वरूप, किस्म और उपजाउता के निर्धारण मे अपक्षय की महत्वपूर्ण भूमिका है।

कोई टिप्पणी नहीं:
Write comment

अपने विचार comment कर बताएं हम आपके comment का इंतजार कर रहें हैं।