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4/07/2021

राशिपातन क्या है? उद्देश्य

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राशिपातन क्या है? (rashipatan ka arth)

राशिपातन मूल्य विभेद का ही एक विशेष रूप है। राशिपातन का अर्थ है वस्तु को घरेलू बाजार की अपेक्षा विदेशी बाजारों मे कम मूल्य पर बेचना। 

अन्य शब्दों मे, राशिपातन से आशय वस्तुओं की विदेशी बाजारों मे उत्पादन से भी कम मूल्य पर बेचने से है। एकाधिकारी विदेशी बाजारों मे मुख्य रूप से औसत लागत (AC) से कम, परन्तु सीमान्त लागत से अधिक मूल्य पर ही अपनी वस्तुओं का विक्रय करता है। परन्तु यह भी संभव है कि राशिपातन वस्तुओं को औसत लागत से अधिक परन्तु सीमान्त लागत से कम मूल्य पर भी बेची जाये।

अतः राशिपातन को लागत के रूप मे परिभाषित करना उचित नही होगा, चाहे वह लागत औसत अथवा सीमान्त लागत हो। कारण यह है कि यदि राशिपातन का अध्ययन लागत के आधार पर किया जाता है, तो यह विश्लेषण अनावश्यक रूप से जटिल हो जायेगा। इस प्रकार राशिपातन विभेदात्मक एकाधिकार का वह रूप है, जिसके अंतर्गत एकाधिकारी अपनी वस्तु (माल) को घरेलू बाजार की अपेक्षा विदेशी बाजार मे कम मूल्य पर विक्रय करता है।

राशिपातन के लिए यह आवश्यक है कि घरेलू बाजार मे एकाधिकारी की वस्तु की मांग की लोच बेलोक हो तथा विदेशी बाजार मे लोचदार हो। यहां यह बात ध्यान देने योग्य है कि राशिपातन घरेलू तथा विदेशी बाजारों मे भी संभव नही होता, क्योंकि यह संभव है कि एकाधिकारी के लिए कोई सुरक्षित बाजार प्रात्प हो, जहां वह अपनी वस्तु को अधिक मूल्य पर बेचता हो और उसका दूसरा बाजार असुरक्षित हो सकता हो, जहां पर वह कम मूल्य पर वस्तु बेचता हो। इस स्थिति को भी राशिपातन कहा जाता है। एकाधिकारी विदेशी बाजार मे अपनी वस्तु की मांग को उत्पन्न करने के लिए अपनी वस्तु को औसत लागत से भी कम पर विक्रय करता है तथा अपनी वस्तु से विदेशी बाजार को पाट देता है। दूसरे शब्दों मे, एकाधिकारी अपनी वस्तु को बहुत बड़ी मात्रा मे डम्प कर देता है। इसलिए इसका नाम डम्पिंग पड़ा। इस प्रकार स्पष्ट है कि राशिपातन के अंतर्गत एकाधिकारी विदेशी बाजार मे उठाई गई हानि को घरेलू बाजार मे अतिरिक्त लाभ द्वारा पूरा करता है।

राशिपातन के उद्देश्य (rashipatan ke uddeshya)

राशिपातन निम्मलिखित उद्देश्यों के किया जाता है--

1. अतिरिक्त उत्पादन को बेचने के लिए 

कभी-कभी मांग का अनुमान लगाते समय किसी भूल या त्रुटि के कारण एकाधिकारी घरेलू बाजार की आवश्यकता से अधिक उत्पादन कर बैठता है। इससे अति-उत्पादन की स्थिति निर्मित हो जाती है। यदि एकाधिकारी अपने अतिरिक्त उत्पादन को घरेलू बाजार मे बेचना चाहता है, तो उसे अपने अतिरिक्त उत्पादन को ही नही वरन् कुल उत्पादन को कम मूल्य पर बेचना पड़ेगा। ऐसी दशा मे एकाधिकारी के लिए अपने अतिरिक्त उत्पादन को घरेलू बाजार मे अधिक मूल्य पर बेचने की अपेक्षा विदेशी बाजार मे कम मूल्य पर बेचना ही लाभदायक होगा।

2. प्रतियोगियों को कुचलने के लिए 

विदेशी बाजारों मे अपने प्रतियोगियों को कुचलने के लिए एकाधिकारी राशिपातन का सहारा लेता है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए वह अपनी वस्तु का मूल्य कम रखकर विदेशी प्रतियोगियों को हतोत्साहित करता है अर्थात् वह अपनी वस्तु की सीमान्त लागत (MC) से भी कम मूल्य पर बेचकर विदेशी प्रतियोगियों को कुचलकर अपने लिए मैदान साफ कर देता है। ऐसी दशा मे विदेशी बाजार मे मुल्य बढ़ाकर अधिकतम लाभ प्राप्त करने मे सफल हो जाता है।

3. विदेशी बाजारों मे मांग सृजन करने के लिए 

अनेक बार एकाधिकारी विदेशी बाजारों मे अपनी वस्तु को कम मूल्य पर बेचता है, जिससे कि इन बाजारों मे वस्तु के लिए नई मांग का सृजन हो सके। जब एक बार उसकी वस्तु की मांग उत्पन्न हो जाती है और उपभोक्ता उस वस्तु के उपभोग के अभ्यस्त हो जाते है, तब वह उसके मूल्य मे वृद्धि कर देता है।

4. मांग की लोच के अंतरों का लाभ उठाने के लिए 

राशिपातन का सहारा मांग की लोच मे होने वाले अंतरों का लाभ उठाने के लिए भी लिया जाता है। चूंकि एकाधिकारी की वस्तु की मांग की लोच विदेशी बाजारों मे अधिक होती है। इसलिए वह राशिपातन द्वारा लाभ उठाने का प्रयास करता है। इसके अतिरिक्त  यह संभव है कि विदेशी बाजारों मे उसके अनेक प्रतियोगी विद्यमान हो, जबकि घरेलू बाजार मे उसका कोई प्रतियोगी नही होता है। यह भी संभव है कि विदेशी बाजारों मे उपभोक्ता उसकी वस्तु की स्थानापन्न वस्तुओं को खरीदने की स्थिति मे हो, और घरेलू बाजार मे उपभोक्ता के लिए यह संभव नही हो। यही कारण है कि एकाधिकारी घरेलू बाजार मे अपनी वस्तु का अधिक मूल्य वसूल करने मे सफल हो जाता है।

5. उत्पत्ति वृद्धि नियम का लाभ उठाने के लिए 

एकाधिकारी उत्पति वृद्धि नियम का लाभ उठाने के लिए भी राशिपातन का आश्रय लेता है। उत्पत्ति वृद्धि नियम अर्थात् वर्द्धमान प्रतिफल के नियम के अंतर्गत एकाधिकारी जैसे-जैसे अपनी वस्तुओं का उत्पादन करता चला जाता है, वैसे-वैसे उसकी औसत तथा सीमान्त लागतों मे कमी आती है। परन्तु घरेलू बाजार मे अपनी वस्तु की मांग बेलोच होने के कारण अतिरिक्त उत्पादन को बेचने के लिए उसे औसत लागत मे हुई कमी से भी मूल्य मे अधिक मात्रा मे कमी करना पड़ेगा। इससे उसका कुछ आगम एवं लाभ और कम हो जायेगा। अतः उत्पत्ति वृद्धि नियम के कारण उत्पन्न अतिरिक्त उत्पादन को विदेशी बाजारों मे बेचना ही एकाधिकारी के लिए लाभप्रद होता है।

संदर्भ; मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रंथ अकादमी, लेखक श्री डाॅ. रामरतन शर्मा जी।

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