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4/07/2021

मूल्य/कीमत विभेद क्या है? परिभाषा, प्रकार

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मूल्य या कीमत विभेद क्या है? 

mulya vibhed arth paribhasha prakar;जब कोई एकाधिकारी एक ही वस्तु के कई मूल्य रखता है, तब ऐसी स्थिति मे "कीमत विभेद" होता है और इस प्रकार एकाधिकार को विभेदात्मक या विवेचनात्मक एकाधिकार कहते है। 

चूंकि एकाधिकार का वस्तु की पूर्ति पर नियंत्रण होने के कारण वह इस स्थिति मे रहता है कि अलग-अलग स्थानों मे स्थित ग्राहकों से अथवा एक ही स्थान मे स्थित अलग-अलग वर्ग के ग्राहकों से वह अलग-अलग मूल्य वसूल कर सके। विभेदात्मक या कीमत विभेद का एक अच्छा उदाहरण रेलवे उद्योग मे मिलता है, जहां अलग-अलग वस्तुओं को ढोने के लिए तथा अलग-अलग श्रेणियों के यात्रियों से विभिन्न दरों से भाड़ा किराया वसूल किया जाता है। इसके अतिरिक्त व्यक्तिगत सेवाओं के विषय मे भी यह बात सत्य होती है। एक डाॅक्टर किसी धनी मरीज से अधिक तथा गरीब से कम फीस लेता है। इस प्रकार विभेदात्मक एकाधिकार के अंतर्गत एक वस्तु के लिए अलग-अलग ग्राहकों से अलग-अलग मूल्य वसूल किया जाता है। 

कीमत/मूल्य विभेद की परिभाषा (mulya vibhed ki paribhasha)

श्रीमती जाॅन राॅबिन्सन के अनुसार," एक ही वस्तु जिसका उत्पादन एक ही उत्पादक द्वारा किया जाता है, तो अलग-अलग ग्राहकों के हाथ अलग-अलग मूल्यों पर बेचने की क्रिया को मूल्य विभेद कहते है।

स्टिगलर के अनुसार," समान वस्तु के लिए दो से अधिक मूल्य वसूल करने को मूल्य विभेद कहते है।" 

टाॅमस के अनुसार," एकाधिकारात्मक नीति की यह विशेषता है कि एक ही वस्तु या सेवा की पूर्ति की विभिन्न स्थितियों के लिए अलग-अलग मूल्य वसूल किया जाता है। इस प्रकार का मूल्य विभेद अलग-अलग व्यक्तियों, अलग-अलग व्यापारी अथवा एक ही समुदाय के अलग-अलग क्षेत्रों या विभिन्न समुदाय से किया जाता है।

कीमत या मूल्य विभेद के प्रकार अथवा स्वरूप (mulya vibhed ke prakar)

मूल्य विभेद के कई प्रकार हो सकते है, जिनमे से मुख्य प्रकार इस तरह है--

1. व्यक्तिगत विभेद 

जब एकाधिकारी अलग-अलग ग्राहकों से अलग-अलग मूल्य वसूल करता है, तो इसे व्यक्तिगत विभेद कहते है। इस दशा मे एकाधिकारी ग्राहकों की मांग की तीव्रता के अनुसार कम या अधिक मूल्य वसूल करता है। जिस ग्राहक की मांग अधिक तीव्र होती है, उससे अधिक तथा जिसकी तीव्रता कम होती है, उससे कम मूल्य वसूल करता है। परन्तु इस प्रकार के विभेद की कठिनाई यह है कि ग्राहकों की मांग की तीव्रता का पता लगाना कठिन होता है तथा दूसरे, इस नीति से ग्राहकों मे असंतोष व्याप्त हो जाता है। ऐसे मूल्य विभेद का उदाहरण डाॅक्टर या वकील का व्यवसाय है, जो अलग-अलग मरीजों (अमीर या गरीब) तथा व्यक्तियों से अलग-अलग फीस वसूल की जाती है।

2. स्थानीय या भौगोलिक विभेद 

जब भिन्न-भिन्न स्थानों मे अलग-अलग मूल्य लिये जाते है, तो इसे स्थानीय या भौगोलिक मूल्य विभेद कहते है। इस प्रकार के मूल्य विभेद करते समय एकाधिकारी यह देखता है कि किस स्थान के बाजार मे प्रतियोगिता है और किस स्थान पर नही है और किस स्थान पर वस्तु के स्थानापन्न उपलब्ध है और कहां पर नही है। 

उदाहरणार्थ, जहां प्रतियोगिता पाई जाती है वहां वह कम मूल्य प्राप्त करेंगा। जहां उसे एकाधिकार प्राप्त है, वहाँ अधिक मूल्य प्राप्त करेंगा। इसी प्रकार जहाँ उसकी वस्तु का स्थानापत्र उपलब्ध है, वहाँ कम मूल्य तथा जहां पर ऐसा नही है वहां अधिक मूल्य वसूल करेगा। ऐसे मूल्य विभेद का सबसे अच्छा उदाहरण "राशि पातन" मे है, जिसमे वह अपनी उत्पादन लागत को कम करने के लिए घरेलू बाजार की आवश्यकता से अधिक वस्तुओं का उत्पादन करता है और फालतू वस्तुओं को विदेशों मे बहुत कम मूल्य पर बेचता है। इस प्रकार विदेशी बाजारों मे अपनी वस्तु के प्रतियोगियों को समाप्त करने के लिए वह कम मूल्य पर बेचता है। इसे राशि पातन कहते है। उदाहरणार्थ, कोई एकाधिकारी अपनी वस्तु का मूल्य मध्यप्रदेश मे कुछ तथा राजस्थान मे कुछ और मूल्य ले सकता है।

3. व्यापारिक या व्यावसायिक विभेद 

जब एकाधिकारी अपनी वस्तु का अलग-अलग व्यवसायों के लिए या अलग-अलग व्यापारियों से अलग-अलग मूल्य वसूल करता है, तो इसे व्यापारिक मूल्य विभेद कहते है। उदाहरणार्थ, साधारण उपभोक्ताओं से रोशनी और पंखे के लिए विद्युत के मूल्य अधिक तथा कारखानों आदि के चलाने के लिए कम मूल्य वसूल किया जाता है।

प्रो. पीगू ने मूल्य विभेद को निम्नलिखित तीन वर्गो मे विभाजित किया है--

(अ) प्रथम श्रेणी का मूल्य विभेद 

प्रथम श्रेणी का मूल्य विभेद वह है, जब एकाधिकारी अपनी वस्तु की अलग-अलग इकाइयों के मूल्य इस प्रकार अलग-अलग रखता है कि प्रत्येक इकाई का मूल्य उसकी मांग के मूल्य के बराबर हो जाये। ऐसी स्थिति मे उपभोक्ता को कुछ भी उपभोक्ता की बचत प्राप्त नही होती। इस विभेद का प्रमुख उद्देश्य यह है कि एकाधिकारी प्रत्येक उपभोक्ता से अधिकतम आय प्राप्त करने मे सफल हो जाता है।

(ब) द्धितीय श्रेणी का मूल्य विभेद 

द्धितीय श्रेणी के मूल्य विभेद मे एकाधिकारी विभिन्न उपभोक्ताओं को कई वर्ग अथवा श्रेणियों मे इस प्रकार विभाजित करता है कि एक निश्चित मांग के मूल्य से अधिक मूल्य देने के लिए प्रस्तुत होने वाले समस्त उपभोक्ताओं से एक मूल्य ही प्राप्त करता है और इसी प्रकार मांग के मूल्य तथा दूसरी कम मांग के मूल्य के बीच वाले उपभोक्ताओं से दूसरा मूल्य वसूल करता है। इस प्रकार ऐसे मूल्य विभेद से उपभोक्ताओं को कुछ बचत प्राप्त हो जाती है। रेलवे उद्योग मे रेलवे के डिब्बे का प्रथम एवं द्वितीय श्रेणियों मे विभाजित इसका महत्वपूर्ण उदाहरण है।

(स) तृतीय श्रेणी का मूल्य विभेद 

तृतीय श्रेणी के मूल्य विभेद के अंतर्गत एकाधिकारी अपने उपभोक्ताओं को अलग-अलग श्रेणियों या बाजार मे विभाजित कर प्रत्येक श्रेणी या बाजार की मांग की लोच के अनुसार अपनी वस्तु का अलग-अलग मूल्य वसूल करता है। इस प्रकार मूल्य विभेद व्यावहारिक जगत मे मिलता है, जबकि प्रथम दो प्रकार के मूल्य विभेद का केवल सैद्धांतिक महत्व है।

मूल्य विभेद का औचित्य 
अथवा 
क्या मूल्य विभेद समाज के लिए लाभदायक या हानिकारक है? 

मनुष्य के आर्थिक अथवा सामान्य जीवन मे प्रायः सभी प्रकार की भेद-भाव पूर्ण नीति को अच्छा नही समझा जा सकता है। अतः मूल्य विभेद की नीति को भी सामान्य जनता बुरा समझती है। पुराने समय मे अनके कंपनियां इसलिए नष्ट हो गई, क्योंकि उन्होंने साधारण बाजारों मे वित्तीय दृष्टि से कमजोर तथा छोटी कंपनियों से कम मूल्य वसूल किया तथा अपनी हानि को पूरा करने के लिए एकाधिकृत क्षेत्र मे ऊंचा मूल्य वसूल किया था। वस्तुतः यह कहा जा सकता है कि मूल्य विभेद सामाजिक न्यान की दृष्टि से अच्छा नही है। परन्तु स्मरण रहे कुछ दशाओं मे मुल्य विभेद समाज के लिए लाभदायक होता है। परन्तु यह कथन पूर्णतः सही नही है क्योंकि मूल्य विभेद सदैव ही उपभोक्ता या समाज के हित के विपरीत होता है। अतः मूल्य विभेद उचित है या नही, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि मूल्य विभेद किन-किन दशाओं किया जा रहा है।

मूल्य विभेद निम्न दशाओं मे लाभदायक होता है--

1. यदि समाज के लिए उपयोगी सेवाओं एवं वस्तुओं के लिए मूल्य विभेद किया जाता है, तो यह उचित मूल्य विभेद कहा जाता है। उदाहरणार्थ, यदि रेलवे प्रथम श्रेणी के यात्रियों के लिए अधिक किराया तथा द्वितीय श्रेणी के यात्रियों से कम किराया लेती है, तो यह उचित मूल्य विभेद होगा।

2. यदि मूल्य विभेद द्वारा निर्धन वर्ग को कम मूल्य पर तथा अमीर वर्ग को अधिक मूल्य पर वस्तुएं एवं सेवाएं बेची जा रही है, तो सामाजिक न्याय की दृष्टि से यह विभेद उचित होगा।

3. यदि उत्पादन अपने अतिरिक्त उत्पादन को विदेशी बाजारों मे बेचने के लिए मूल्य विभेद की नीति अपनाता है, तो यह उचित है। चूंकि एकाधिकारी उत्पादक अपने अतिरिक्त उत्पादन को बेचने के लिए घरेलू बाजार मे अधिक मूल्य तथा विदेशी बाजारों मे कम मूल्य रखता है। इस प्रकार अतिरिक्त उत्पादन तथा उत्पादन क्षमता मे वृद्धि करने के लिए मूल्य विभेद उचित है।

4. यदि देश के निर्यात व्यापार मे वृद्धि के उद्देश्य से विदेशी बाजारों मे कम मूल्य पर तथा घरेलू बाजार मे अधिक मूल्य पर वस्तुएं बेची जा रही है, तो मूल्य विभेद उचित होगा।

5. यदि मूल्य विभेद से देश के कुल उत्पादन मे अपेक्षाकृत वृद्धि होती है तो यह मूल्य विभेद समाज के लिए उचित है, क्योंकि कुल उत्पादन मे वृद्धि होने से देश के आर्थिक कल्याण मे वृद्धि होती है।

मूल्य विभेद निन्म दशाओं मे हानिकारक होता है--

1. यदि मूल्य विभेद के कारण उत्पत्ति के साधनों का अधिक उपयोगी प्रयोगों मे हस्तांतरण संभव नही है, तो मूल्य विभेद हानिकारक है।

2. मूल्य विभेद उस दशा मे उचित नही कहा जा सकता, जब एकाधिकारी अपने लाभ को अधिकतम करने के उद्देश्य से अपनी वस्तुओं का मूल्य घरेलू बाजार मे ऊँचा रखकर तथा वस्तु की कम मात्र बेचता है।

संदर्भ; मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रंथ अकादमी, श्री डाॅ. रामरतन शर्मा जी।

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