भारत चीन युद्ध, कारण और पराजय

चीन का भारत पर आक्रमण 

12 जुलाई, 1962 को लद्दाख में गलवान नदी की घाटी की भारतीय सैनिक चौकी को चीन ने अपने घेरे में लिया। अक्टूबर 1962 को चीन सेनाओं ने उत्तर-पूर्वी सीमांत तथा लद्दाख मोर्चे पर एक साथ बड़े पैमाने पर आक्रमण कर दिया तथा 21 नवम्बर, 1962 को अचानक एक पक्षीय युध्द विराम की घोषण भी कर दी गई।
आज के इस लेख मे हम भारत-चीन युद्ध के कारण, भारत चीन युद्ध मे भारत की पराजय के कारण और भारत चीन युद्ध के परिणामों को जानेंगे।

चीन द्वारा भारत पर आक्रमण के कारण 

1. चीन विस्तारवादी नीति का समर्थक था तथा इस नीति का प्रदर्शन करना चाहता था।
2. चीन ने भारत पर आक्रमण करने से पूर्व यह अच्छी तरह जान लिया था कि युद्ध में उसी की विजय होगी। वह यह जानता था कि भारत को यह कल्पना भी नही हो सकती कि चीन भारत पर आक्रमण कर सकता हैं।
3. चीन आक्रमण कर अपनी शक्ति प्रदर्शित करना चाहता था ताकि उसे अधिक शक्तिशाली माना जाए ताकि एशिया में उसका नेतृत्व स्थापित हो जाए।
भारत चीन युद्ध
भारत चीन युद्ध 
4. भारत की लोकतांत्रिक पद्धति को सफल न होने देने के लिए उस युद्ध का बोझ लाद देना चाहता था।
5. तिब्बत के प्रति भारतीय नीति से चीन नाराज था। दलाईलामा को शरण देने के कारण वह भारत से नाराज हो गया था।
6. भारत और चीन दोनों की विचारधाराओं मे भिन्नता हैं। चीन एक  साम्यवादी देश है। भारत एक प्रजातांत्रिक देश है। विचारधारा की इस प्रतिस्पर्धा मे चीन साम्यवादी विचारधार की क्षेष्ठता सिद्ध करना चाहता था।

7. अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति मे शक्ति प्रदर्शन की इच्छा भारत नवोदित राष्ट्रों का मुख्य वक्ता बन गया था। गुटनिरपेक्षता आन्दोलन के कारण भारत की प्रतिष्ठा बढ़ी थी। चीन नही चाहता था कि भारत का सम्मान हो अतः उसने भारत को अपमानित करने के लिए ही भारत पर आक्रमण किया।

भारत चीन युद्ध में भारत की पराजय (असफलता) के कारण 

1. भारत की सैनिक शक्ति के प्रति उदासीनता
भारत ने स्वतंत्रता के बाद अपनी रक्षा के लिए सबसे महत्वपूर्ण अंग सेना की और कोई विशेष ध्यान नही दिया। हमारी सीमा के बिल्कुल निकट ही चीन ने बहुत बड़ी मात्रा में सेनाएं और शस्त्र जमा कर लिए थे तथा हवाई अड्डे भी बना लियें थे उसकी गतिविधियों मे बहुत तेजी थी। हमारे प्रधानमंत्री को इसकी गुप्तचर विभाग से लगातार रिर्पोट मिल रही थी परन्तु हमारे प्रधानमंत्री अन्त तक इस बात पर दृढ़ रहे कि चीनियों से हमारा कोई बड़ा युध्द नही होगा।

2. सेना के आधुनिकीकरण पर ध्यान न देना
हमारे देश मे यह निरन्तर धारणा चल रही थी कि भारत गाँधी जी का देश है, वहाँ पर अहिंसा का प्रभाव है, जब तक हम किसी पर आक्रमण नही करते, तो हमारे ऊपर कौन आक्रमण करेगा? इन धारणाओं के कारण हमारी सरकार ने प्रतिरक्षा पर उचित ध्यान नही दिया।


3. सेना में असंतोष
डी.आर.मानकेकर ने लिखा है कि "प्रतिरक्षा मंत्री श्री कृष्णमेनन ने अपनी गलत नीतियों के द्वारा सेना मे असन्तोष उत्पन्न कर दिया। उन्होंने कनिष्ठ अधिकारियों को वरिष्ठ अधिकारियों के विरुद्ध खड़ा कर दिया।

4. चीन की सुदृढ़ स्थिति 
सन् 1954 से ही चीन युद्ध की तैयारी कर रहा था। उसने अपने नक्शों मे भारतीय सीमा का काफी भाग अपने अधिकार में दिखाया था। भारत की सीमा तक चीन ने पक्की सड़कों का निर्माण कर लिया था। अतः उसे सैनिक सामान तथा रसद पहुँचाने मे कोई कठिनाई नही हुई। भारत की सीमा पर उसके सैनिकों का जबर्दस्त जमाव था। युद्ध की दृष्टि से चीन की स्थिति सुदृढ़ थी। चीन पहाड़ी पर था। वह पहाड़ की ऊँचाईयों से नीचे प्रहार कर सकता था।


चीन को विश्वास था कि सोवियत संघ उसका साथ देगा किन्तु सोवियत संघ तटस्थ रहा तथा चीन पर युद्ध करने के लिए दबाव डारता रहा। मिस्र, यूगोस्लाविया, घाना आदि गुटनिरपेक्षता देशों ने चुप्पी साध ली। पाकिस्तान ने चीन का साथ देते हुए भारत की खुलकर निन्दा की। पूर्वी तथा पश्चिमी देशों ने चीन को सहायता नही दी अतः चीन ने एक पक्षीय युध्द विराम की घोषणा कर दी। भौगोलिक स्थिति, सैन्य तैयारी का आभाव, पड़ोसी देश पर अत्यधिक विश्वास, युद्ध साम्रगी की कमी तथा सैन्य संगठन एवं निर्देशन की अक्षमता, अव्यावहारिकता विदेश नीति के कारण भारत बुरी तरह पराजित हुआ। चीन को अपने उद्देश्यों मे सफलता मिल गई। अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र मे यह प्रकट करना चाहता था कि वह युद्ध प्रेमी नही हैं, बाध्य होकर युद्ध करना पड़ा, भारत को पराजित कर उसकी प्रतिष्ठा को धूमिल करना चाहता था।

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