हिन्दी कहानी, खूँटे का घोड़ा

नमस्कार दोस्तो स्वागत है आप सभी का आज मे लेकर लाया हूँ एक अच्छी हिन्दी कहानी यह कहानी बड़ी ही रोचक और मज़ेदार हैं, कहानी का नाम खूँटे का घोड़ा हैं। तो चलिए पढ़ते है इस मजेदार कहानी को।

हिन्दी कहानी, खूँटे का घोड़ा 

बातों सी मीठी, कहानी सी झूठी। घड़ी-घड़ी विश्राम जाने सीताराम। शक्कर का घोड़ा शकरपारे की लगाम। ऐसे-ऐसे बिधिया की नानी, एक दिन कहने लगी कहानी।
एक था बंजारा। बड़ा ही सीधा नेक और दयालू। उसके पास था एक ऊंचा -पूरा, तेज तर्रार घोड़ा। बंजारा घोड़े को बहुत प्यार करता था। एक दिन की बात है।  ........
इतना कहकर नानी हो गई चुप। बुधिया के मन में मच गई खलबली। उसने पूछा- " बताओं न नानी! क्या हुआ उस दिन?" नानी ने खांसकर गला साफ किया और बोली-

उस दिन बंजारा घोड़े पर बैठकर कहीं जा रहा था। उसका रास्ता गुजरता था जंगल से। जंगल मे था खूब बड़ा तालाब। बंजारे ने सोचा, चलूँ घोड़े को पानी पिला दूँ। वह तालाब के किनारे गया और घोड़े ने पिया जी भरकर पानी। बंजारा चलने लगा तभी एक गड्ढ़े में एक बूढ़ा आदमी दिखाई दिया। बंजारे को देखकर उस बूढ़े आदमी ने आवाज़ दी अरे भाई! मुझे यहाँ से निकाल दो। अगर मे यही पड़ा रहा तो भूखा-प्यासा मर जाऊँगा। बंजारे को दया आ गई। उसने बूढ़े आदमी को गड्ढ़े से बाहर निकाला।
बूढ़े आदमी ने कहा- "तुम भले आदमी हो। मै पास मे ही रहता हूँ। लोग मुझे बाबा कहकर बुलाते है, घास काटते समय धोखे से इस गड्ढ़े मे गिर पड़ा था। तुम न आते तो न जाने कब तक इसी मे पड़ा रहता। अगर कोई मुश्किल आ पड़े तो मेरे पास जरूर आता। मैं तुम्हारी मदद करूँगा।" इतना कहकर बाबा अपनी झोपड़ी की ओर चला गया। बंजारे ने भी अपना रास्ता पकड़ा।

एक बार की बात है। बंजारे को अपने डेरे पर लौटते समय रात हो गई। सुना रास्ता साँय-साँय चलती हवा और बियाबान जंगल। बजारा चौकन्नी निगाह किए घोड़े पर बैठा चला जा रहा था। अचानक क्या देखा कि पेड़ के नीचे एक आदमी खड़ा है। उस आदमी ने बंजारे को टोका- "अरे! इतनी रात मे कहाँ जा रहे हो? जंगल की राह। उस पर अकेले कही कोई खतरनाक जानवर मिल जाए तो क्या करोगे?"
बंजारे ने कहा- "करूँ भी तो क्या? डेरे पर तो जाना ही होगा।" वह आदमी बोला- "मेरा गाँव पास में ही है। चलो मेरे साथ रात भर रूकना, सुबह अपनी राह लेना। बंजारे ने कहा- पर तुम्हें बेकार मे परेशानी होगी।" "परेशानी की क्या बात? तुम मेरा घर थोड़ी ही साथ ले जाओगे।" उस आदमी ने बंजारे की बात का जवाब दिया।
बंजारा उसकी मीठी-मीठी बातें सुनकर उसके साथ हो लिया। उस आदमी ने बंजारे को अपने घर ले जाकर खूब आवभगत की। घोड़े को भी एक खूँटे से बाँधा। दाना खिलाया। बंजारे को खाट पर सुलाया और स्वयं जमीन पर सोया। बंजारा मन में सोचता हैं- "कितना भला है यह आदमी।" यह सोचते-सोचते बंजारा सो गया चैन की नींद। सबेरे मुर्गे ने बाँग दी तो बंजारा जागा। वह आदमी भी उठा। बंजारे ने हाथ मुँह धोया और दातुन की। अपने घर ठहराने के लिए उस आदमी को धन्यवाद दिया। बंजारा चलने को तैयार हुआ। जैसे ही उसने अपने घोड़े की लगाम को हाथ लगाया वह आदमी चिल्लाया-"अरे! यह क्या, मेरा घोड़ा कहाँ ले जा रहे है?" बंजारा घबराकर बोला- "तुम्हारा घोड़ा। घोड़ा तो मेरा हैं।" वह आदमी डपटकर बोला- "चुप रहो, यह मेरा घोड़ा है। कल रात को ही तो मेरे खूँटे ने इस घोड़े को जन्म दिया है। खूँटा भी मेरा, घोड़ा भी मेरा।" बंजारे के तो यह सुनकर होश ही उड़ गए। यह कैसी मुसीबत गले आ पड़ी। बंजारा बोला- "भाई हँसी मत करो। घोड़ा मेरा है। रात मे इसी पर बैठकर तो मैं तुम्हारे घर आया था।"

वह आदमी क्यों मानने वाला था, बोला- "नही घोड़ा मेरा हैं।" दोनों झगड़ने लगे। बंजारा कहता- "घोड़ा मेरा है।" वह आदमी कहता- "घोड़ा मेरा है।" दोनों का झगड़ा सुनकर उस आदमी के दोनों पड़ोसी भी आ गए। बंजारे ने उनसे कहा- "देखों भाइयों कैसा अन्धेर है। यह आदमी मेरे घोड़े को अपना बता रहा है।" बंजारे को क्या मालूम था कि वह आदमी और उसके दोनों पड़ौसी ठग थे। मिलजुलकर सीधे-साधे लोगों को ठगते थे। उन दोनों ने ठग की हाँ मे हाँ मिलाई और बंजारे को डरा-धमकाकर भगा दिया। नानी ने आगे की कहानी सुनाई..........
मुसीबत का मारा बंजारा, हैरान-परेशान। क्या करें कहाँ जाए? बंजारे को बूढ़े बाबा की याद आई। वह जंगल में तालाब के पास पहुंचा। बंजारे ने बाबा को पुकारा। बंजारे की आवाज़ सुनकर बूढ़ा बाबा झट से अपनी झोपड़ी से निकल आया। बाबा ने कहा- "आओ बंजारे भाई! कैसे हो?" बंजारे ने घोड़ा छीने जाने की सारी कहानी सुनाई। बाबा बोला- "चिन्ता मत करो। उन ठगों को ऐसा सबक सिखाऊँगा कि जीवन भर याद रखेंगे।"

दूसरे दिन बाबा और बंजारा जा पहुंचे उस गांव के मुखिया के पास। बंजारे ने सारी घटना मुखिया को बताई और घोड़ा वापिस दिलाने की विनती की। मुखिया ने घोड़ा समेत उस ठग को बुलवाया। मुखिया ने ठग से पूछा- "तुमने बंजारे का घोड़ा क्यों ले लिया?" ठग ने कहा- "मुखिया जी घोड़ा तो मेरा है। कल रात को ही मेरे खूँटे ने इसे पैदा किया है। इस बात के कई गवाह है।" उसके दोनों पड़ोसी ठगों ने गवाही दी कि हाँ, हाँ, ऐसा ही हुआ।

मुखिया यह सुनकर सोच में पड़ गया मुखिया जानता था कि ये लोग चोर और ठग हैं पर मिलकर झूठ बोलने और गवाही देने के कारण बचे रहते है। बाबा यह सब देख रहा था। उसने सोचा मौका अच्छा है। वह झूठ-मूठ सोने लगा। मुखिया ने उसे जगाकर पूछा- "तुम किस लिए आए हो और सो क्यों रहे हो? बाबा बोला- "मुखिया जी, मैं जंगल में एक तालाब के किनारे रहता हूँ। कल रात आपके गाँव का यह आदमी घोड़े पर बैठकर आया। इसने तालाब के पानी मे आग लगा दी। जब मैं पानी में लगी आग बुझाने लगा तो इससे मेरी एक हजार अशर्फियाँ चुरा लीं और भाग आया। इससे मेरी अशर्फियाँ दिला दीजिए।

मुखिया बाबा की बात समझ गया। उसने उस ठग से एक हजार अशर्फियाँ देने को कहा। ठग बोला- "मुखिया जी, यह बूढ़ा झूठ बोल रहा हैं। आप ही बताइए कहीं पानी में आग लगती है क्या?"
बाबा ने कहा- "जब लकड़ी का खूँटा जीते-जागते घोड़े को जन्म दे सकता है तो पानी में आग क्यों नही लग सकती?"
मुखिया ने ठग से कहा- "इनका कहना ठीक है या तो बंजारे का घोड़ा लौटाओं या एक हजार अशर्फियाँ दो।" अब क्या था? पलट गया पाया। अछता-पछताकर ठग ने लौटाया बंजारे का घोड़ा। मुखिया ने ठगों को किया गाँव से बाहर। बंजारा बाबा की चतुराई की बड़ाई करता अपने डेरे पर लौट गया।

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