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2/09/2021

प्रबंधकीय लेखांकन और वित्तीय लेखांकन मे अंतर

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प्रबंधकीय लेखांकन और वित्तीय लेखांकन मे अंतर 

prabandhkiya lekhankan or vittiya lekhankan me antar;वित्तीय लेखांकन प्रबंधकीय लेखांकन का ही एक अंग है। समस्त लेखांकन वित्तीय ही है, इसका कारण यह है, कि वित्तीय लेखांकन मे व्यावसायिक घटनाओं को मौद्रिक रूप मे व्यक्त किया जाता है, और प्रबंध इन्हें प्रतिवेदनों एवं विवरणों के रूप मे स्वीकार करता है। प्रबंध लेखांकन, वित्तीय लेखांकन का स्थान नही ले सकता, प्रबंध लेखाविधि केवल इसके आधारभूत ढ़ाँचे मे जो कमियाँ है, उन्ही को पूरा करता है, जिससे आधुनिक प्रबंध की विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके। जहां वित्तीय लेखांकन का कार्य समाप्त होता है, वही प्रबन्धकीय लेखांकन का कार्य प्रारंभ होता है। प्रबन्धकीय लेखांकन और वित्तीय लेखांकन एक-दूसरे के पूरक है। इसके बावजूद भी इन दोनों लेखाविधियों मे कुछ कुछ मौलिक अंतर पाया जाता है। वित्तीय लेखांकन और प्रबंधकीय लेखांकन मे निम्न अंतर है--

1. उद्देश्य सम्बंधित अंतर 

वित्तीय लेखांकन का उद्देश्य व्यावसायिक लेन देनों का लेखा करके आर्थिक परिणामों की जानकारी देना एवं निश्चित तथि को वित्तीय स्थिति बताना है। 

जबकि प्रबंधकीय लेखांकन का उद्देश्य प्रबंधकों को उनके कार्यों के कुशल निष्पादन हेतु आवश्यक सूचनाएँ प्रदान करना है।

2. लेखांकन सिद्धांत सम्बंधित अंतर 

वित्तीय लेखांकन मे वित्तीय विवरण तैयार करते समय दोहरी प्रणाली एवं लेखांकन के सामान्य सिद्धांतों को प्रयुक्त किया जाता है। 

जबकि प्रबंधकीय लेखांकन मे विशष्ट उद्देश्यों की पूर्ति के लिये अलग-अलग विषयों पर अलग-अलग सिद्धांत प्रयुक्त किये जा सकते है।

3. अनिवार्यता सम्बंधित अंतर 

वित्तीय लेखांकन प्रत्येक व्यवसाय के लिए अनिवार्य है। कंपनी अधिनियम 1956 के अंतर्गत वित्तीय लेखांकन अनिवार्य कर दिया गया है। 

प्रबन्धकीय लेखांकन व्यवसाय के लिए अनिवार्य नही है बल्कि ऐच्छिक है। प्रबन्धकीय लेखांकन के लिए कोई ऐसा कानून नही है, जो इसे अपनाने के बाध्य करें।

6. क्षेत्र सम्बंधित अंतर 

वित्तीय लेखांकन का क्षेत्र सीमित है, क्योंकि इसमे लागत लेखा, सांख्यिकी आदि तकनीकों का प्रयोग नही किया जाता। जबकि प्रबंधकीय लेखांकन का क्षेत्र व्यापक है, क्योंकि इसमे लागत लेखा, वित्तीय लेखे, सांख्यिकी आदि सभी तकनीकों का प्रयोग किया जाता है।

7. अविध सम्बंधित अंतर 

वित्तीय लेखे एक निश्चित अवधि के बाद सामान्यतः एक वर्ष के तैयार किये जाते है। 

जबकि प्रबंधकीय लेखांकन मे प्रतिवेदन एवं विवरण थोड़े-थोड़े समय के अंतर पर तैयार एवं प्रस्तुत किये जाते है।

8. व्यवहारों का समावेश सम्बंधित अंतर 

वित्तीय लेखांकन मे केवल उन्ही व्यवहारों का वर्णन किया जाता है, जो मुद्रा मे व्यक्त किये जा सकते है। क्योंकि अमौद्रिक तथ्य वित्तीय लेखांकन को प्रभावित नही कर सकते है, इसलिए इनका समावेश यहां नही किया जाता है। 

प्रबन्धकीय लेखांकन मे अमौद्रिक परिवर्तनों एवं घटनाओं का भी वर्णन किया जाता है, जैसे तकनीकी, परिवर्तन, उपभोक्ताओं की रूचि, प्रतिस्पर्धात्मक वातावरण, कर्मचारियों का दृष्टिकोण, मुद्रा के मूल्य परिवर्तन इत्यादि। प्रबन्धकीय निर्णयों को अमौद्रिक तथ्य भी प्रभावित कर सकते है। अतः प्रबन्धकीय लेखांकन मे इनका समावेश आवश्यक है।

9. अंकेक्षण सम्बंधित अंतर 

वित्तीय लेखांकन सम्बन्धी सभी समंकों का अंकेक्षण संभव है। आजकल तो अधिकांध संस्थाओं मे अंकेक्षण अनिवार्य हो गया है। 

प्रबन्धकीय लेखांकन मे संबंधित समंकों का अंकेक्षण संभव नही होता। आजकल प्रबंध अंकेक्षण किया जाने लगा है।

10. सूचना की शुद्धता सम्बंधित अंतर 

वित्तीय लेखांकन मे मौद्रिक सूचनायें पूर्ण शुद्ध होना चाहिए। जबकि प्रबंधकीय लेखांकन मे सूचनाओं की पूर्ण शुद्धता पर उतना अधिक जोर नही दिया जाता।

11. विषय सामग्री सम्बंधित अंतर 

वित्तीय लेखांकन किसी संपूर्ण व्यावसायिक उपक्रम के लिये तैयार किये जाते है।

प्रबन्धकीय लेखांकन मे लेखे एवं विवरण व्यवसाय के लिये तैयार नही किये जाते, बल्कि इनकी तैयारी का आधार विभाग, खण्ड, उत्पाद उपकार्य आदि होता है।

12. पक्ष सम्बंधित अंतर 

वित्तीय लेखांकन मे बाहरी पक्षों जैसे-- अंशधारी, बैंक, सरकार आदि के प्रयोग के लिए खाते तैयार किये जाते है। 

प्रबन्धकीय लेखांकन लेखा विधि प्रबंध के लिए आवश्यक सूचनाओं का संकलन तथा संवहन करती है। 

13. प्रकाशन की अनिवार्यता सम्बंधित अंतर 

वित्तीय लेखांकन मे सूचनाएं बाहरी पक्षों के लिये अनिवार्य रूप से प्रकाशित करनी पड़ती है। 

जबकि प्रबंधकीय लेखांकन मे सूचनाओं का प्रकाशन करना अनिवार्य नही है।

14. तथ्यों का स्वभाव सम्बंधित अंतर 

वित्तीय लेखांकन मे जो सौदे हो जाते है उनका लेखा किया जाता है। इसमे मौद्रिक तथ्यों का ही उल्लेख किया जाता है। प्रबन्धकीय लेखांकन मे भूतकालित घटनाओं एवं तथ्यों का प्रयोग होता है। इसमे मौद्रिक अमौद्रिक सभी प्रकार के तथ्यों का उल्लेख किया जाता है।

16. प्रारूप सम्बंधित अंतर 

वित्तीय लेखांकन मे लेखे प्रस्तुत करने के लिए सर्वमान्य प्रारूप होता है। यह प्रारूप कुछ वित्तीय लेखो की स्थिति मे सरकार द्वारा भी निर्धारित होता है। जैसे- कंपनी का आर्थिक चिट्टा। प्रबन्धकीय लेखांकन मे सूचना का संकलन एवं प्रस्तुतीकरण प्रबन्धकीय आवश्यकताओं को ध्यान मे रखकर किया जाता है। यहाँ सूचना प्रस्तुतीकरण का कोई सर्वमान्य प्रारूप नही होता। 

17. सवंहन की शीघ्रता सम्बंधित अंतर 

वित्तीय विवरणों मे ज्यादातर हित बाहारी पक्षों का होता है तथा एक ही अवधि विशेष के बाद ही इसे बनाया जाता है, अतः इसमे सूचना का संवहन शीघ्र होना आवश्यक नही होता है।प्रबन्धकीय लेखांकन का मुख्य उद्देश्य ही प्रबंध को निर्णयन मे सहायता पहुँचाना होता है, अतः सूचना का शीघ्रता से संवहन होना यहां अनिवार्य है, अन्यथा महत्वपूर्ण निर्णयों मे विलम्ब हो सकता है।

शायद यह जानकारी आपके लिए काफी उपयोगी सिद्ध होंगी

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