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2/11/2020

सामाजिक अनुसंधान का अर्थ, परिभाषा, विशेषताएं, महत्व, सीमाएं

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सामाजिक अनुसंधान या सामाजिक शोध का अर्थ (samajik anusandhan arth)

Samajik anusandhan arth paribhasha visheshta mahatva simaye;सामाजिक अनुसंधान शब्द दो शब्दों सामाजिक+अनुसंधान से बना है। सामाजिक अनुसंधान का अर्थ जानने से पहले हमें अनुसंधान शब्द का अर्थ समझना आवश्यक है।
अनुसंधान शब्द की उत्पत्ति एक ऐसे शब्द से हुई है जिसका अर्थ "दिशाओं मे जाना" अथवा खोज करना होता हैं। अनुसंधान वह व्यवस्थित वैज्ञानिक पद्धति है जिसमें वैज्ञानिक उपकरणों के प्रयोग द्वारा वर्तमान ज्ञान का परिमार्जन, उसका विकास अथवा किसी नये तथ्य की खोज द्वारा ज्ञान कोष मे वृद्धि की जाती है। स्पष्ट है की सामाजिक तथ्यों,घटनाओं एवं सिद्धांतों के सम्बन्ध मे नवीन ज्ञान की प्राप्ति हेतु प्रयोग मे लायी गयी वैज्ञानिक पद्धति ही सामाजिक अनुसंधान हैं।
दुसरे शब्दों मे, सामाजिक अनुसंधान का अर्थ सामाजिक अनुसंधान या सामाजिक शोध जैसा कि इसके नाम से स्पष्ट है- सामाजिक जीवन के बारे मे नवीन तथ्यों की जानकारी प्राप्त करने से सम्बंधित हैं।
यह भी पढ़ें; सामाजिक अनुसंधान (शोध) के चरण

सामाजिक अनुसंधान की परिभाषा (samajik anusandhan paribhasha)

मोजर के शब्दों में "व्यवस्थित जानकारी, जो सामाजिक घटनाओं और समस्याओं के सम्बन्ध में की जाती है, सामाजिक शोध कही जाती हैं।
यंग के अनुसार "सामाजिक तथ्य परस्पर-सम्बंधित प्रक्रियाओं की विधिवत् खोज और विश्लेषण सामाजिक शोध है।
कुक के शब्दों में " किसी समस्या के संदर्भ मे ईमानदारी, विस्तार तथा बुद्धिमानी से तथ्यों, उनके अर्थ तथा उपयोगिता की खोज करना ही शोध है।
मुनरो के अनुसार " शोध उन समस्याओं के अध्ययन की एक विधि है जिन्हें अपूर्ण अथवा पूर्ण समाधान तथ्यों के आधार पर ढूँढ़ना है।
सी. वी. गुडे के अनुसार," आदर्श रूप मे अनुसंधान एक समस्या का सावधानीपूर्वक और निष्पक्ष भाव से किया गया अध्ययन होता है जो तथ्यों की भिन्नता, उनके स्पष्टीकरण व सामान्यीकरण पर निर्भर होता है।
जी.एम. फिशर के अनुसार," किसी समस्या को हल करने अथवा एक परिकल्पना की परीक्षा करने अथवा नई घटना या नये संबंधो को खोजने के उद्देश्य से सामाजिक परिस्थितियों मे उपयुक्त कार्य-विधि का प्रयोग करना ही सामाजिक शोध है।" 
श्रीमती पी. वी. यंग के अनुसार," सामाजिक अनुसंधान अथवा शोध को एक ऐसे वैज्ञानिक प्रयास के रूप मे परिभाषित किया जा सकता है जिसका उद्देश्य तार्किक और क्रमबद्ध पद्धतियों के द्वारा नये तथ्यों का अन्वेषण अथवा पुराने तथ्यों की परीक्षा और सत्यापन, उनके क्रमों, पारस्परिक संबंधो, कार्य-कारण की व्याख्या तथा उन्हें संचालित करने वाले स्वाभाविक नियमों का विश्लेषण करना है।"
बोगार्डस के अनुसार," साथ-साथ रहने वाले व्यक्तियों के जीवन में क्रियाशील अन्तर्निहित प्रक्रियाओं की जानकारी प्राप्त करना ही सामाजिक अनुसन्धान है।" 
समाज विज्ञान ज्ञानकोष के अनुसार," अनुसन्धान वस्तुओं, अवधारणाओं तथा प्रतीकों आदि को कुशलतापूर्वक व्यवस्थित करना है, जिसका उद्देश्य सामान्यीकरण द्वारा ज्ञान का विकास, परिमार्जन अथवा सत्यापन होता है, चाहे वह ज्ञान व्यवहार में सहायक हो अथवा कला में।"
कुक के अनुसार," किसी समस्या के संदर्भ में ईमानदारी, विस्तार तथा बुद्धिमानी से तथ्यों, उनके अर्थ तथा उपयोगिता की खोज करना ही अनुसन्धान है।"
क्रॉफोर्ड के अनुसार," अनुसन्धान किसी समस्या के अच्छे समाधान के लिए क्रमबद्ध तथा विशुद्ध चिन्तन एवं विशिष्ट उपकरणों के प्रयोग की एक विधि है।
हिटने के अनुसार," समाजशास्त्र अनुसंधान में मानव-समूह के सम्बन्धों का अध्ययन होता है।" (
गुड के अनुसार," आदर्श रूप में अनुसंधान एक समस्या का सावधानीपूर्वक और निष्पक्ष भाव से किया गया अध्ययन होता है जो तथ्यों की भिन्नता, उनके स्पष्टीकरण तथा सामान्यीकरण पर निर्भर करता है।"  
फिशर के अनुसार," किसी समस्या को हल करने अथवा एक परिकल्पना की परीक्षा करने अथवा नयी घटना या नये सम्बन्धों को खोजने के उद्देश्य से सामाजिक परिस्थितियों में उपयुक्त कार्यविधि का प्रयोग करना ही सामाजिक अनुसंधान है।"
संक्षेप में," सामाजिक अनुसंधान वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा सामाजिक घटनाओं और सामाजिक समस्याओं के कारण इनके अन्तःसम्बन्धों का ज्ञान, उनमें निहित प्रक्रियाओं का अध्ययन, विश्लेषण और तदनुसार परिणामों का ज्ञान प्राप्त किया जाता है।"
समाज में अनेक प्रकार की समस्याएँ होती हैं, हम इन समस्याओं का निदान करना चाहते हैं। समस्याओं के निदान के लिए व्यवस्थित ज्ञान की आवश्यकता होती। सामाजिक अनुसन्धान के माध्यम से सामाजिक समस्याओं के सम्बन्ध में हमें व्यवस्थित ज्ञान की प्राप्ति होती है। उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट हो जाता है कि अनुसंधानकर्ता के निरन्तर प्रयोग तथा प्रयत्न से जो ज्ञान की वृद्धि करे, अनुसंधान कहलाता है । शोध नूतन ज्ञान की प्राप्ति तथा उपलब्ध ज्ञान की व्याख्या करता। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें तथ्यों का अवलोकन, वर्गीकरण, साधारणीकरण तथा सत्यापन के चरण क्रम से होते हैं। अनुसंधान एक ऐसा प्रयत्न है जिसमें नवीन ज्ञान की खोज तथा उपलब्ध ज्ञान में परिवर्तन भी मालूम करना होता है।

सामाजिक अनुसंधान की विशेषताएं (samajik anusandhan visheshta)

सामाजिक अनुसंधान की विशेषताएं निम्न प्रकार है--
1. सामाजिक जीवन से सम्बंधित
सामाजिक शोध सामाजिक जीवन से सम्बंधित होता हैं। सामाजिक शोध के अन्तर्गत सामाजिक जीवन के समस्त पहलुओं का अध्ययन किया जाता हैं।
2. पारस्परिक सम्बन्धों की खोज 
समाज मे अनेक प्रकार की सामाजिक घटनाएं अलग-अलग दिखाई देती हैं, किन्तु आन्तरिक दृष्टि से ये घटनाएं अन्त:सम्बंधित है। सामाजिक शोध मे इन्हीं अन्त: सम्बंधित कारको की खोज की जाती है।
3. विश्वसनीय ज्ञान की प्राप्ति 
सामाजिक अनुसंधान मे हमें नवीन ज्ञान तो प्राप्त होता ही है, साथ ही ऐसा ज्ञान भी प्राप्त होता है, जिस पर विश्वास किया जा सके।
4. सामाजिक प्रगति मे सहायक
समाज मे निरन्तर परिवर्तन हो रहे है। इन परिवर्तनों से समाज का विकास होना तो स्वाभाविक है, किन्तु समाज की प्रगति तभी सम्भव है, जब विकास को सामाजिक कल्याण की दृष्टि से किया जाये और प्रगति का मूल्यांकन किया जा सके।
5. नवीन और प्राचीन तथ्यों की खोज
सामाजिक शोध के माध्यम से सामाजिक जीवन से सम्बंधित तथ्यों की खोज जाती है। तथ्यों को दो भागों मे विभाजित किया जा सकता है। प्राचीन और नवीन समाजशास्त्र के अन्तर्गत व्यक्ति और समाज का अध्ययन किया जाता है। ये दो दोनों ही गतिशील है। इस गतिशील प्रकृति के कारण प्राचीन तथ्यों को नवीन परिस्थितियों मे लागू करना पड़ता है।
6. पुराने तथ्यों का पुनर्सत्यापन 
समाजशास्त्र की विधि केवल नवीनतम या घटनाओं की खोज में ही नहीं है। समाज गतिशील है इसलिए यह आवश्यक है कि समाज से संबंधित उन तथ्यों का भी समय-समय पर पुनर्सत्यापन किया जाए जो कि हमें पहले से ही ज्ञात है। ऐसा करने से हमें यह ज्ञात होता है, कि उन तथ्यों की वर्तमान स्थिति क्या है? एवं पहले की तुलना में उनमें क्या परिवर्तन गठित हुए हैं? इससे यह सुनिश्चित करने में विश्वास है कि वर्तमान अवस्थाओं के संदर्भ में कहां तक उपयोगी है अथवा उनके किस पक्ष में क्या परिवर्तन अपेक्षित है यथा पहले से ही विदित तथ्यों का पुनः सत्यापन भी सामाजिक अनुसंधान के अंतर्गत किया जाता है।
7. सामाजिक अनुसंधान की प्रकृति वैज्ञानिक है 
सामाजिक अनुसंधान में समाज से संबंधित नवीन तथ्यों की खोज करने में पूर्व से विदित तथ्यों को सत्यापित करने के लिए अनुमापन, कल्पना, तथा दर्शन का सहारा ना लेकर निरीक्षण, परीक्षण, प्रयोग विश्लेषण और निष्कर्ष निरूपण पर आधारित वैज्ञानिक पद्धति का उपयोग किया जाता है।
8. सामाजिक अनुसंधान अनुभवपरक है 
सामाजिक अनुसंधान का कार्य कहीं सुनी-सुनाई बातों पर आधारित ना होकर अध्ययन करता के द्वारा स्वयं अनुभव किए जाने वाले अथवा ज्ञात किए जाने वाले तथ्यों पर आधारित होता है।
9. सामाजिक सिद्धांतों के निरूपण मे सहायक 
सामाजिक घटनाओं का अध्ययन करने अथवा पूर्व से ही ज्ञात तथ्यों को पुनः सत्यापित करने की प्रक्रिया में सामाजिक अनुसंधान के मध्य से अनेक नवीन सिद्धांतों की स्थापना में सहायता मिलती है।  सामाजिक परिवर्तन, सामाजिक व्यवस्था, संरचना एवं प्रकारों के तथ्यों से संबंधित अधिक सिद्धांत सामाजिक अनुसंधान के ही परिणाम है।
10.  सामाजिक अनुसंधान का सैद्धांतिकी व प्रकार्यात्मक उपयोग 
सामाजिक अनुसंधान के माध्यम से सामाजिक घटनाओं का कार्य-कारण आत्मक अध्ययन कर जहां समाज से संबंधित नवीन तथ्यों की जानकारी मिलती है। वही सामाजिक समस्याओं के निराकरण के उपाय भी ज्ञात होते हैं इस प्रकार सामाजिक अनुसंधान सामाजिक व्यवस्था और सामाजिक प्रगति में सहायता करता है। यही सामाजिक अनुसंधान का प्रकार्यात्मक या व्यवहारिक पक्ष हुआ। दूसरी ओर सामाजिक अनुसंधान के माध्यम से सामाजिक व्यवस्था, जड़ता, परिवर्तन, समाज के संस्थात्मक ढांचे, प्रगति आदि के विषय में सिद्धांतों की स्थापना में भी सहायता मिलती है।
11. सामाजिक घटनाओं के संबंध मे कार्य कारणात्मक विवेचन करना
कोई भी सामाजिक घटना ना तो बिना किसी कारण के घटित होती है और ना ही कोई घटना परिणाम रहित होती है। उदाहरण स्वरुप शासन के द्वारा आरक्षण नीति लागू करने के पीछे कुछ निश्चित उद्देश्य कारण रहे हैं।  इसी प्रकार आरक्षण की नीति कार्यान्वित करने का प्रभाव आरक्षण के कारण लाभन्वित हुए लोगों पर तथा शेष समाज पर भी पड़ा है। सामाजिक अनुसंधान के माध्यमों से किसी सामाजिक घटना के लिए उत्तरदाई कारणों तथा उनके परिणामों के विषय में तथ्यात्मक जानकारी मिलती है।

सामाजिक अनुसंधान या शोध का महत्व (samajik anusandhan mahatva)

सामाजिक शोध जैसा कि इसके नाम से स्पष्ट है, सामाजिक जीवन और घटनाओं को जानने का प्रयास है। संसार अनेक रहस्यों से भरा पड़ा है। मानव जिज्ञासु प्राणी है, जो इन रहस्यों का उद्घाटन करना चाहता है। सामाजिक जीवन और घटनाओं को उद्घाटित करना सामाजिक शोध की मूल आत्मा है। सामाजिक अनुसंधान का महत्व इस प्रकार हैं----
1. अज्ञानता का नाश
अनुसंधान विभिन्न सामाजिक घटनाओं के सम्बन्ध मे वैज्ञानिक ज्ञान देकर उन घटनाओं के सम्बन्ध मे हमारे अज्ञान को दूर करता हैं।
2. ज्ञान की प्राप्ति 
सामाजिक अनुसंधान से नवीन ज्ञान मिलता हैं। इससे न केवल जिज्ञासाओं का समाधान होता है, वरन्  इससे प्रगति के रास्ते पर आगे बढ़ना सम्भव नही होता है। नवीन ज्ञान के पुनर्निर्माण मे सहायक होता है।
3. वैज्ञानिक अध्ययन
सामाजिक अनुसंधान का तीसरा महत्व सामाजिक समस्याओं के वैज्ञानिक अध्ययन और विश्लेषण से सम्बंधित है। आधुनिक युग विज्ञान का युग है। इस युग मे प्रत्येक अध्ययन को तब तक स्वीकार नही किया जाता , जब तब कि वह वैज्ञानिक आधार पर न हो।
4. भविष्यवाणी करने मे सहायक
सामाजिक अनुसंधान भविष्यवाणी करने मे सहायक होता हैं। कभी-कभी  समाज को भविष्य के बारे मे जानकारी नही होती है। इस कारण समाज को आगे बढ़ाने मे कठिनाई का अनुभव होता है। जिस प्रकार से वैज्ञानिक जीवन और जगत की घटनाओं के आधार पर संकेत देते है, ठिक इसी प्रकार का संकेत समाजशास्त्री भी कर सकते है।
5. समाज कल्याण
समाज कल्याण आधुनिक समाज की जरूरत है। सामाजिक संरचना मे विद्यमान तत्व ही विभिन्न समस्याओं का वास्तविक कारण होते है। सामाजिक शोध द्वारा इन तत्वों का ज्ञान प्राप्त करके समाज का संगठित कर सकते हैं।
6. समाज सुधार मे सहायक
सामाजिक शोध से प्राप्त ज्ञान का व्यावहारिक उपयोग समाज सुधारक और प्रशासक करते है। इससे सामाजिक सुधार एवं प्रशासन के संचालन मे सामाजिक शोध महत्वपूर्ण सहायता प्रदान करता हैं।
7. प्रभावशाली सामाजिक नियंत्रण के लिए
सामाजिक नियंत्रण की समस्या प्रत्येक विकासशील देश के सम्मुख नए रूप में सामने आती है, क्योंकि सामाजिक नियंत्रण के प्रचलित साधन नई परिस्थितियों में इतने प्रभावशाली नहीं रहते हैं। प्राचीन भारतीय समाज में प्रथाएं परंपराएं रूढ़ियां, धर्म, ग्राम पंचायत के साथ-साथ संयुक्त परिवार और जाति व्यवस्था भी सामाजिक नियंत्रण में महत्वपूर्ण योगदान देती थी। परंतु औद्योगिक एवं नागरीकरण के बढ़ते प्रभाव के कारण परिवर्तित परिस्थितियों में अब यह नियंत्रण के साधन अपना प्रभाव खो रहे हैं। इनके स्थान पर कानून न्यायालय पुलिस सेना आदि सामाजिक नियंत्रण के साधन प्रयोग में लाए जा रहे हैं। परंतु इन नए साधनों पर लोगों का इतना विश्वास नहीं है। की इन साधनों से उन्हें न्याय मिलने की उम्मीद कम ही है। ऐसी परिस्थितियों में समाज में अनुशासनहीनता और उदण्ता में वृद्धि हो रही है। सामाजिक शोध के द्वारा ही इन साधनों को प्रभावशाली बनाया जा सकता है।
8. सामाजिक परिवर्तन को समझने के लिये 
विकासशील समाज में परिवर्तन की गति तेज रहती है। परिवर्तनशील समाज संक्रमण कालीन अवस्था से गुजरने वाला समाज होता है। ऐसे समाजों में नए प्रकार की समस्याएं उत्पन्न होती है। साथ ही परिवर्तन किस समय हो रहा है, यदि यह मालूम ना हो तो वह समाज अपने लक्ष्यों से भटक सकता है। भारतीय समाज के साथ वर्तमान में यही घटित हो रहा है पुराने संस्थाएं खत्म हो रही हैं और नई संस्था उत्पन्न हो रही है। क्या छोड़े? क्या पकड़े? क्या करें? इस दुविधा में सामान्य जन फंसे हैं। ऐसी स्थिति में उन्हें सही मार्गदर्शन की आवश्यकता है सामाजिक शोध के द्वारा परिवर्तन की सही दिशा का आकलन कर जन सामान्य को उसके प्रति मार्गदर्शन किया जा सकता है। ताकि वे सही दिशा का चुनाव कर सकें। इस प्रकार भारत में सामाजिक शोध का लोकव्यापीकरण जरूरी प्रतीत होता है।
9. राष्ट्रीय एकता के लिये 
भारत एक कल्याणकारी राष्ट्र है। परंतु प्रदेशवाद, भाषावाद, जातिवाद सांप्रदायिकता आदि व्याधियां भारतीय समाज में व्याप्त है। राजनीतिक नेता चुनाव जीतने के लिए तथा सस्ती लोकप्रियता एवं धन अर्जित करने के लिए इन सब का खुलकर प्रयोग करते हैं। सामान्य जनता भी अपने थोड़े से स्वार्थ के लिए नेताओं की बातों का अनुसरण करती है। इससे राष्ट्रीय एकता आज भी भारतीय समाज के लिए एक बड़ी समस्या बनी हुई है सामाजिक शोध के द्वारा इन समस्याओं का निराकरण किया जा सकता है इस प्रकार शोध के द्वारा राष्ट्रीय एकता के लिए भी प्रयास किए जा सकते हैं।

सामाजिक अनुसंधान की सीमाएं (samajik anusandhan ki simaye)

विभिन्न सामाजिक विज्ञानों की अनुसंधान संबंधी समस्या होती है और यही बात समाजशास्त्री अनुसंधान पर भी लागू होती है। इन समस्याओं तथा कठिनाइयों के कारण समाजशास्त्री अनुसंधान की वैज्ञानिक प्रकृति के संबंध में आपत्ति उठाई जाती है। सामाजिक अनुसंधान की सीमाएं इस प्रकार हैं--
1. सत्यापन की समस्या 
सामाजिक अनुसंधान द्वारा विभिन्न विषयों पर किए गए अध्ययन के निष्कर्षों की विश्वसनीयता को ज्ञात करना वैज्ञानिक दृष्टिकोण से बहुत जरूरी है। परंतु सामाजिक घटनाएं व्यवहार प्रक्रिया मुक्त होती है जिसका कोई स्वरूप नहीं होता उनकी पुनरावृत्ति करना भी संभव नहीं है। अतः निष्कर्षों की वैज्ञानिकता का परीक्षण करना सामाजिक अनुसंधान की मुख्य समस्या है।
2. प्रायोगिक अनुसंधान का अभाव 
प्राकृतिक विज्ञानों की भांति सामाजिक विज्ञान में प्रयोग एक विधियों का प्रयोग प्रायः नहीं के बराबर होता है, क्योंकि इन विधियों के प्रयोग के लिए सामाजिक विज्ञानों में अभी तक समुचित दिशाओं का अभाव होता है। इसलिए कार्य कारण संबंधों की खोज में समस्या आती है।
3. सामाजिक घटनाओं की जटिलता तथा गतिशीलता 
सामाजिक घटनाओं तथा समस्याओं की प्रगति सदैव परिवर्तनशील होती है। जो निरंतर समय अनुसार बदलती है, साथ ही विभिन्न घटनाओं के कारण किसी एक पक्ष से संबंधित ना होकर बहुपद के कारणों का परिणाम होती है यही वजह है कि समाजशास्त्री अनुसंधान में अलग-अलग करके सामाजिक घटना के घटित होने में प्रत्येक के प्रभाव को नहीं आंका जा सकता। ऐसी स्थिति में सामाजिक अनुसंधान के मार्ग में एक बहुत बड़ी बाधा उपस्थित होती है।
4. वैषयिकता का अभाव 
वैषयिकता का अर्थ है- पक्षपात रहित अथवा टथस्थता। साधारणतया एक अनुसंधानकर्ता जो सामाजिक जीवन के विभिन्न पहलुओं का अध्ययन करता है, वह चयन उसका तटस्थ होता है। अतः वह अपनी जाति, परिवार, धर्म,  विभाग तथा परंपरा आदि का अध्ययन निष्पक्ष होकर नहीं कर पाता। यही वजह है कि सामाजिक अनुसंधान में वैषयिकता का अभाव होता है।
5. सुनिश्चित माप की समस्या 
सामाजिक अनुसंधान में सामाजिक संबंधों व्यवहारों तथा मानवीय प्रकृति का प्रमुख रूप से अध्ययन किया जाता है। इसकी प्रकृति गुणात्मक होती है परिमाणात्मक नही, जिनका मापना संभव नहीं। इसका कारण यह है कि सामाजिक घटनाओं को मापने का कोई सार्वभौमिक पैमाना विकसित नहीं हुआ है। ऐसी स्थिति में सामाजिक अनुसंधानकर्ता के समक्ष घटनाएं उपस्थित होती है कि वह यथार्थ माप कैसे करें?
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